रसगुल्ला
जोशी मय परिवार शादी में हाजिर थे। लिफाफा साथ था मगर उसमें रुपये नहीं डाले गये थे। चार का परिवार साथ ले चले थे। स्नैक्स और डिनर मिला, जितना पेट पचा पाता,उस हिसाब से शगुन देने का विचार था।
बेटा जाकर मुआयना कर आया था। बात रसगुल्ले में जा अटक गयी।
"पप्पा, खाना तो जोरदार लागे हैं, पर स्वीट डिश में मजा न आई?"
" काहे, आजकल दुई-तीन तो मीठा रखा ही जात है। ईहा काहे कंजूसी बरत लिये।"
" मीठा तो रही पर रसगुल्ला न दिखी कहियो।"
"ऐसई बात!! तो भरो फिर एक सौ इकायावन!! तुम सब खाई पी के तईयार रहो। सब निपट ले फिर शंकर का खबर लेई। कम सा कम कान में तो डालई दे। बड़ा डी़गे हाँके रहे। बताओ, मीठा मा रसगुल्ला न रखवाई।"
जरूरत से ज्यादा खा सब अलग खड़े हो गये। मियां-बीवी शगुन थमाने गये। लिफाफा बहुत जोरदार था। जोशी वही हिलाते चले।
शंकर ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया,"और जोशी, खाना वाना खाया ?
"हाँ, खाना तो खा लिये।" फिर थोड़ा अलग हटा कर ले गये, फुसफुसा कर बोले," यार शंकर, सब इंतजाम किये। पर मीठा में रसगुल्ला नहीं दिखा। पेट तो भर लिये पर आत्मा न भरी। खैर, हो जाता है, इतना इंतजाम में।" कह लिफाफा थमा रुठे फूफाजी की तरह दुल्हा-दुल्हन के सिर पर आर्शीवाद का हाथ रख, एक दो फोटु खिंचवा गेट की ओर बढ़ लिए। चलते चलते पान की चार गिलोरियाँ बंधवायी और तीन चार तरह की मीठी सुपारी से रसगुल्ले की कमी पुरी की।
उधर शंकर मन ही मन उनके बेटे की शादी में हिसाब बराबर करने के मंसूबे बनाने लगे थे।
अंजू निगम
देहरादून
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