नभ में पौ फटी और सूरज ने अपनी लालिमा बिखेर दी|
सूमि को रात देर से नींद आयी थी|चाची की आवाज से वो चौंक कर उठ बैठी| वक्त देखा और जल्दी अपनी चुन्नी संभालती कमरे से बाहर हो ली|
" सुमि तुझे कितनी बार कहा कि गरम पानी की बाल्टी ऊपर पहुँचा जाया कर पर आजकल तेरा दिमाग जाने कहाँ घुमा रहता हैं"? चाची की घुड़की प्रसाद के रुप में सुबह-सुबह उसे मिल चुकी थी|
सुमि के हाथ जल्दी-जल्दी चलने लगे| घर के काम निपटा अपनी चचिया बहनो के साथ उसे भी तो अपने काम पर जाना हैं| चाची की इतनी मेहरबानी तो हुई थी कि उन्होने सूमि को अपनी बुटीक खोल लेने की इजाजत दे दी थी|
सुमि जब १२ साल की ही थी| एक हादसे ने उसके माँ- बाप को लील लिया था|उम्र के उस
से अब तक उसने जीवन के जाने कितने रंग देख लिये थे|चाची की सहानभूति अब तिरोहित हो चुकी थी|उस पर उम्र से पहले ही गृहस्थी का जाने कितना भार लाद दिया था| एक तरह से सुमि के लिये ये अच्छा भी था| इन सारी जिम्मेदारियों ने उसे वक्त से पहले परिपक्व कर दिया था|
कुदरत ने भी उसे गजब की सहनशक्ति दी ये सब सहन कर लेने की| वो मुँह बंद किये सारे काम निपटाती| चाचा मुक दर्शक बने सब देखते|
भगवान ने उस पर एक रास्ता बंद कर मानो दूसरा रास्ता खोल दिया हो| उसकी कड़ी मेहनत से बुटीक खुब अच्छी चल निकली थी| उसके कारीगर परिवार की तरह ही काम करते| यहाँ सुमि को वो सुकून तो मिलता ही जो घर में कभी नसीब न हुआ|
उसकी सेवा ने ही शायद ये चंद खुशी के पल उसके जीवन में उतारे हो| ज्यादा चाहने की इच्छा तो माँ-बाप के साथ ही होम हो गयी थी|
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