बैसाखी

बैसाखी

वो खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी। ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई। 
       "रेनू के हाथ में जादू है। एक बार उसके सिले कपड़े पहन लोगी तो दूसरे किसी दर्जी की तरफ मुड़ोगी भी नहीं।" शिखा ने बड़े विश्वास के साथ जब कहा तो मैंने भी सोचा,जरा उसके कहे को परख लूँ पर जगह देख सारा जोश ठंडा पड़ने लगा।
  "शिखा ने भी कहाँ फंसा दिया, चढ़ते चढ़ते दम फुलने लगा।" सोचते शिखा को  सौ लानते भेजी।
  रेनू अपनी माँ के साथ रहती थी| दरवाजा उसकी माँ ने ही खोला| चेहरा शिष्ट, सौम्य|
   मैंने आने की वजह बताई। "आईये बैठिए , शिखा ने बता दिया था| रेनू बस आती होगी। आज देर हो गई|" कह पानी लेने अंदर चली गई।
  घर एकदम साफ, स्वच्छ| सारा सामान करीने से समेटा गया| मैं कमरे का मुआईना करती रही।
   ट्रे में पानी का गिलास रखे जब वो आई तो बात करने के इरादे से मैं बोल उठी,"आपकी बेटी के हाथो का जादू हमे यहाँ खींच लाया। वैसे सूट की सिलाई कितनी हैं?" पता होते भी मैंने पूछ लिया।
"सिपंल सूट के ढाई सौ और कुछ डिजाइनर बनवाना हो तो पाँच सौ से छः सौ के बीच|" एकदम प्रोफेशनल की तरह उन्होंने सिलाई बतायी।
  "हमारी बुटीक वाली कुमकुम तो हमारे पैसो का मोह ही नहीं करती| जो मुँह से कह दे वही देना पड़ता है। जी.एस.टी का तमगा दिखा पक्की रसीद भी नहीं देती। फिटिंग इतनी बढ़िया देती है कि छोड़ा नहीं जा रहा ।"मेरे मन ने खाका खींचा।
   तभी रेनू की मम्मी सिलाई की बानगी दिखाने के लिए तीन चार सूट उठा लायी।देख मेरी आँखो की चमक बढ़ गयी| इतना बारीक और साफ काम। डिजाइनर सूट तो लाजवाब लग रहे थे।" इनके तो कुमकुम पंद्रह सौ से कम न लेती और दस अहसान से हमे अलग लपेटती।" मैंने मन ही मन हिसाब लगाया।
  तभी सीढ़ियों से किसी के ऊपर आने की आवाज आई|"लगता है रेनू आ गई।" बोल रेनू की मम्मी सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी| रेनू ही थी। दोनो हाथो में बैसाखी लिए।
  जिन सीढियों को चढ़ते समय मुझे हफनी आ गई,उसे रेनू कम से कम एक बार तो जरूर चढ़ती-उतरती होगी| मेरा मन खुद पर शर्मिंदा हो उठा।
   उसने शायद मेरे मन के भाव पढ़ लिए थे।
"आपका नाम सुन कर यहाँ आई थी।आप जितने पैसे लेगी ,मैं देने को तैयार हूँ।" मुझे लगा नहीं कि ये दया का सागर लहरा मैं उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा रही हूँ।
  बहुत हल्के पर दृढ़ आवाज में वह बोली,"मुझ पर दया मत दिखाईये। मेरे लिए स्वाभिमान ऊँचा है पैसा नहीं।" 
मुझे लगा कि बैसाखी की जरूरत उसके पैरों से ज्यादा मेरी सोच को हैं।

अंजू निगम
देहरादून

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top