सीवन

सीवन

"रोटी-शोटी खा ले|" कपड़े में लिपटे रोटीदान को कंधे से उतारते जस्सी बोल उठी| उसके दूसरे हाथ में छाछ की तपेली थी| बिंदा आ ,लस्त सा जमीन पर बैठ गया|
"बहुत गर्मी गिर रही है इस बार|"
जस्सी ने बिंदे को देखा| जेठ ने उसका सारा रंग ले लिया था|"हम्मम" कह उसने के बिंदे के आगे थाली रख दी|
"दो कौर तु भी ठेल ले| सुऐरे से काम में बनी है|"
" मैं खा लूँगी |पहले तू मुँह झुठा कर ले|" जस्सी को बिंदे की फ्रिक अच्छी लगी|
वो सुच्चे मन से बैठ गयी|सामने लहलहाता खेत खड़ा था| जस्सी का मन जूड़ गया|
"रब्बा खैर करे|इस बार खेत पूरा भरा है| सोने के दाने उग रहे है|"जस्सी के आगे गिरवी रखी सोने की बालियाँ चमक गयी|
बिंदे को जस्सी की ये टोक खल गयी|"अरे निगोड़ी,तुझे हर काम में टोक देनी है| पिछले बार की याद है ,आधा खेत नुच गया था |"
जस्सी की भवे तन आई,"पिछला न सुना| तेरा आधा खेत साहूकार का गोदाम खा गया था| वहाँ तो तेरी जुबान गीली लकड़ी रहती है| बस धुआं छोड़ती है ,आग न दिखती|"
बिंदे का हौसला मरा था| वो अपनी हथेलियाँ बाँचने लगा|मन में सोच उठी," इन लकीरों को सारी जिदंगी उधेड़ा पर जाने वो कहाँ रूठी बैठी है|
जस्सी ने जब बिंदे का ये हाल देखा तो पिघल गयी," तु हौल क्यों खाता है| इस बार तुझे साहूकार की कैसी आब| तूने बैंक का लोन लिया है, सूद भी चढ़ेगा तो साहूकार सी पकड़ नहीं रखेगा| बीज-खाद भी देख ,कितने सुच्चे है|  तुझे खबर है कि अबकी आधा गाँव साहूकार की ओर से मुड़ गया है| इस बार साहूकार का गल्ला खाली जायेगा| "
फसल कटने के पहले साहूकार की ऐलानी आई,सारे गाँव के लिए| अगले दिन बैठक जूड़ेगी|
बैठक में साहूकार अपनी करनी पर उतरा,"तुम सब खूब सयाने हो गये हो| बैंक की ओट लगा रहे हो| जाओ,जहाँ बसर हो पर मेरा बकाया दे कर|"
"हाँ आज सारा हिसाब-किताब होगा| देखे,किसके नाम कितना ब्याज लिया और कितना सूद चढ़ा?सबके बहीखाते यही मँगवाओ|"बैंक के बड़े अफसर का फरमान आया|
साहूकार को ऐसी कुछ उम्मीद नहीं थी| पुराने बहीखाते तो हेर-फेर दिये गये थे,पर नये में कलम की नोक नहीं चल पायी थी|
"आज देखे बकाया किसका निकलता है|" अफसर के रौब के नीचे साहूकार दबा था| 
  इस बार साहूकार बकाये के लपेटे में घिरा था| और आज उसके हाथ की  सीवन उधड़ रही थी|

अंजू निगम
देहरादून

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