पुरवाई



पुरवाई 

"अरे !!!रमेसी!! कब आया सहर से?" काका की आवाज खुशी से चमक रही थी|
"आये तो पंद्रह दिनो से ऊपर हो गये| पर यहाँ आये के पहले ,वो नजदीक का अस्पताल वाले धर लिये| वही चौहद दिनो का वनवास काट के कल ही गाँव आये गये रहेन| सोचे खेतो की तनिक सुध ले लूँ|"
"अच्छा हुआ भईया, जो खेत बेच के न गये| कौनो ठौर तो रही अब| बढ़िया किये जो वापसी कर ली|"
"हाँ कक्का!! खाने रहने सब का जुगाड़ खतम हो गया था| परदेस में कोई हाथ थामने वाला न बचा|सोचे, मरना ही हैं तो अपनो के बीच मरे| कोई मिट्टी देने वाला तो हो|"
"ऐसा असुभ न निकालो रमेसी| तुमको मालूम, तुम्हारे बाद कितना लड़कन सहर की ओर भाग गये
रहे| आधा गाँव खाली हुई गया था| तुम भी तो पलट कभी गाँव का सुध न लियो| चलो, अब धीमे धीमे गाँव भर जाई| सच पूछो तो बड़ी हौल उठती थी| गाँव का रौनक तो तुम्ही लोगन में बसी थी|" काका का चेहरा सूरज सा खिल गया था|
"शहर की चकाचौंध ने मति हर ली थी| हाड़ तोड़ मेहनत के बाद दो जून रोटी मिलती थी| और बसर को एक खोली| बड़े दलीद्दर में रहे काका| न इज्जत, न रोटी, न गाँव का हवा पानी|"
रमेशी की बात सुन काका पसीजे तो फिर तनिक रोष से बोले," लल्ला, आज मजबूरी पड़ी तो तुम गाँव मुड़ आये | कल जरूरत होगी तो फिर सहर का रास्ता पकड़ लेगा|"
"न काका, अब नाही| फिर कक्का, अब जे वो पूराना गाँव कहाँ रह गया!! कितना तो तरक्की उतर आयी| और फिर यही विपदा ने तो सिखाया, गाँव की मिट्टी  और अपनो का मोल|"
    रमेशी का मन अब पुरवाई सा बहने लगा था|

अंजू निगम
देहरादून


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