रामलाल की बिटिया निम्मो की आज शादी हैं|
दो गली छोड़ श्यामलाल के घर से रामलाल के घर के पूराने संबंध हैं| पारिवारिक रिश्ते बहुत ही प्रगांण हैं|
दोनो की परचुन की काफी पुरानी दुकाने थी| अगल-बगल में ही| दोनो चलती भी बहुत थी| इधर श्यामलाल की दुकान ज्यादा चल निकली थी| कारण उसकी दुकान का माल खरा होता था|आज तक किसी ग्राहक की तरफ से कोई शिकायत नहीं आयी थी|
उधर रामलाल का ध्यान अपनी दुकान की तरफ कम हो गया हैं| दुकान का माल उसका भी खरा होता था पर जब मालिक ही आँख बंद कियेे बैठा हैं तो नौकरो की को चांदी हो गई|श्यामलाल ने ढके-छिपे लहजे में रामलाल को टोहका दिया पर ज्यादा फर्क पड़ा नहीं| नौकरो की हेर-फेर शुरु हो गई| नतीजा रामलाल का व्यापार घटने लगा|
रामलाल कान के भी थोड़ा कच्चे थे| फिर जाने इन दोनो की दोस्ती के कितने दुश्मन बने बैठे हैं| फिर ज्यादा मीठे में कीड़े भी तो पहले पड़ते हैं| इन्हीं में से किसी हमदर्द ने रामलाल के कान भर दिये| जहर ये उगला कि श्यामलाल की ही वजह से दुकान ठप्प होती जा रही हैं| क्यों,कैसे ये जानने की रामलाल ने जुगत न भिड़ायी| नतीजन दोनो के रिश्तों में गांठ पड़ गयी|
श्यामलाल रामलाल के रुखे व्यहवार से आहत हुआ| पर दोनो के परिवार पर इसकी आंच न आई| यही शायामलाल को संतोष था|
घर पर निम्मो की शादी की बात चली और रिश्ता भी तय हो गया| श्यामलाल की दुल्हन यानि सेठानी ने नेग भी सोच लिया| आखिर लड़की का बचपन उनके यहाँ ही तो गुजरा था| चाची ही मानती थी निम्मो उन्हे|
धक्का तो तब लगा जब शादी की तारीख सब तय हो गयी और श्यामलाल के परिवार को कानो-कान खबर न हुई|निम्मो ही चाची के कान में सारी बात
उड़ेल गयी|
एक महीना खिसकता गया| निम्मो की शादी की तैयारी का सारा उल्लास सेठानी की आँखो में ही सिमट गया| विवाह-पञिका भी न पहुँची और शादी का दिन आ पहुँचा|
श्यामलाल को यही लगा कि मय परिवार सहित कही चले जाये और विवाह के बाद ही वापस आये|कम से कम दुनिया को हंसने का मौका तो नहीं मिलेगा|
शादी भी निपट गयी| एकदम भोर में श्यामलाल के दरवाजे पर दस्तक हुई| कौन हैं सोचते हुए दरवाजा खोला तो सामने निम्मो खड़ी थी| शादी का लाल जोड़ा पहने| श्यामलाल के पीछे सेठानी चली आयी| निम्मो को दरवाजे पर देख ठगी सी रह गयी| निम्मो ने ही आगे बढ़ चाची को गले लगा लिया| और जी भर रोये दोनो|
चाची निम्मो को स्नेह से अंदर ले आयी| और अलमारी खोल उसके दोनो हाथो में सोने के कगंन पहना दिये| निम्मो न न ही करती रह गयी|
" चाची भी कहती हैं और शगुन लेने से भी इंकार करती हैं| तेरे ही हाथो में पहनाने को तो लिये थे|" कह सेठानी की आँखे भीग उठी|
बेटी की विदाई में देर हो रही थी| यही सोच रामलाल को श्यामलाल की देहरी तक आना पड़ा|
" चाचा- चाची को कभी न छोड़ पाऊँगी| आज मेरी विदाई इसी देहरी से होगी|" निम्मो का फैसला आ गया| दोनो परिवारो को जोड़े रखने वाली कड़ी तो थी न| फिर इन्हें कौन बिखेर सकता था|
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