नीली कुरती

आज परीक्षा का पहला दिन था| नीला ने पूरी तैयारी कर ली थी| वो होनहार छाञा थी| उसमें व अव्या में होड़ लगी रहती कक्षा में प्रथम आने की और उसके लिये दोनो कड़ी मेहनत करते थे|
         यूँ तो नीला को अपनी मेहनत पर पूरा यकीन था पर जाने क्यों उसे अपनी नीली कुरती पर अपनी मेहनत से ज्यादा यकीन था| उसे लगता कि जब भी वो नीली कुरती पहनेगी उसके हर काम सफल होगे| चाहे वो पढ़े या न पढ़े| माँ ने कोशिश तो बहूत की कि नीला के मन से ये वहम निकल जाये पर वो भी नीला का ये विश्वास न डिगा पायी|
      कल रात ही नीला ने वो कुरती धो कर प्रेस कर ली थी| अब को उसे परीक्षा में प्रथम आने से कोई न रोक पायेगा|
      कुरती बदरंग हो चुकी थी और कई जगहो से घिस गयी थी| नीला पर तो भुत सवार था पर माँ को यही लगता कि लोग यही कहेगे कि बिटिया को ढंग की कुरती भी नहीं दिला पाये|
    पहला पेपर गणित का था| जरुरत से ज्यादा जागने और पढ़ लेने का नतीजा ये हुआ कि नीला की आँखे नीदं से भारी होने लगी और उसके सवाल हो गये गलत| समय पर पूरा पेपर भी हल न हो पाया|
      नीला ने दो-तीन बार अपनी कुरती चेक की| वही कुरती हैं न!!!! कहीं बदल तो नहीं गयी| दो उसका पेपर ठीक न हो पाया|पर कुरती तो वही थी उसकी पसंद की|
     नीला का वो भ्रम अब टुटने लगा था| उसकी नीली किरती अब वाकई पुरानी होने लगी थी| उसका वो ' जादू' अब खत्म हो गया था|

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