समय

समय

ईशा स्कूटी स्टैंड में लगा घर के अंदर प्रविष्ट हुई|सामने स्वरा बैठी थी पर ईशा उसे अनदेखा कर किचन की ओर बढ़ गयी|उसका ये व्यवहार स्वरा को आहत करता हैं, ईशा अच्छे से जानती थी|
    किचन में बरतनो की उठा-पटक से स्वरा को याद आया कि ये लड़की जो सुबह इतनी मुँहजोरी कर गयी हैं, तो अन्न का एक दाना इसके मुँह में नहीं गया हैं|
    स्वरा ने उठ पूरा खाना बनाया| पर न उसने ईशा को खाना बन जाने पर खाने का आग्रह किया,न थाली परोस उसके कमरे तक गयी|
"जुबान के साथ थोड़ा हाथ भी चला ले तो अच्छा|"
  आज स्वरा भी बेटी के व्यवहार का उसी के अंदाज में जवाब दे रही थी|
    ऐसा नहीं था कि ईशा की बढ़ती बदजुबानी से स्वरा ने विनय को अवगत नहीं कराया हो पर वे "बच्ची हैं"करके टाल जाते| इससे ईशा को शह मिलती|
      जो लड़की बचपन में माँ का पल्लू न छोड़ती थी,विनय का लाड़ कब ईशा को स्वरा से छिटका गया,उसे गुमान न हो पाया|
      माँ के आज के व्यवहार की शिकायत पापा से करने को ईशा शाम तक पापा की राह जोती रही|शाम को पापा के आते ही वह शिकायत का पिटारा खोल बैठ गयी|
   "बेटा अभी तो आकर बैठा हूँ|हर समय माँ ही गल्त नहीं होती| जरूर तुम्हारी ओर से भी गल्ती रही होगी|"आज पहली बार विनय ने स्वरा का पक्ष लिया था|ईशा पापा के इस अंदाज पर हैरान थी|
   माँ पर जलती नजर डालती वो दनदनाती अपने कमरे में चली गयी| उसके कमरे का दरवाजा भड़ाक से बंद हुआ|
     उधर स्वरा सोच रही थी|कि ये टोक पहले हो गयी होती तो आज सारे रिश्तों को उनकी गरिमा मिलती|

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