आधुनिक

आधुनिक

वो बहुत देर से सड़क किनारे टिका हुआ था| उसकी टोकरी अमरुदो से भरी हुई थी| वो कुछ बिक्री हो जाने भर के लिए लोगो को बेबस नजरो से ताक रहा था| अगर आज भी फल न बिके तो आज का भी फांका समझो|
    विषेला धुंआ छोड़ती गाडियां और इधर-उधर भागते लोग| किसी को उसकी ओर नजर उठा कर देखने की भी फुरसत न थी|
  सुबह से शाम खींच आयी| उसकी बिक्री न के बराबर रही| टोकरी भारी थी| अगर कोई हाथ लगा टोकरी सिर पर रख दे तो | अब वो नयी आस लगाये आने-जाने वालो को ताकता है| नतीजा सिफर|
  तभी कुछ नयी उम्र के लड़के वहाँ से निकलते हैं|वो आशा भरी आवाज दे विनती करता है कि टोकरी पर बस हाथ लगा दे, पर उनकी नजरे हिकारत से उसे देखती आगे बढ़ जाती है| उसकी आँखो में बेबसी उतर आती है| तभी उनमें से एक लड़का आगे बढ़ हाथ लगा टोकरी उसके सिर पर रखवा देता है| वो बेकस आदमी लड़के पर आशीषो की झड़ी लगा देता है|
    "रहेगा वही देहाती का देहाती"!!झुड़ में से एक लड़का तंज कसता हैं|
" ऐसे आधुनिक हो जाने का भी क्या फायदा जो इंसानियत भूला दे|" कह वो लड़का भी आगे बढ़ जाता है|

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