और कितने बंसत
नेह का आज छबीसंवा बसंत लगा था| लड़कियां कितनी जल्दी उम्र के पढ़ाव पार करती हैं न!! पर ये बसंत के आगमन माँ की आँखे भादो कर देते थे| नेह की साथ की सारी लड़कियाँ एक एक कर अपने मायके की देहरी नाप ससुराल चली गई थी|
माँ के हाथ ने जाने कितनी पीली साड़ियों के किनारे गोटेदार बना लिये, एक आस अटकाये| नेह का मन भी तो जेठ की तपिश सह रहा था| क्या माँ इस सच से अछुती थी कि वो अनिकेत से अपना मन बांध चुकी हैं और उससे विलग वो नहीं हो पायेगी| फिर क्यों ये झुठी आन के शगुफे उठाये हैं!! मान दोनो तरफ का ज्यादा था|
उस दिन घर में कोई नहीं था| नेह काम के सिलसिले में शहर के बाहर थी| अनिकेत को कुछ जरूरी कागजात लाने नेह के घर आना पड़ा| ऐसी जगह जहाँ अनिकेत का स्वागत नहीं था,वो भी जाने में हिचक रहा था| पर कागज जरूरी थे,लाये बिना कोई चारा न था| माँ ने अनिकेत को सामने देखा और अपना आपा खो बैठी| फिर उन्होंने अनिकेत को इतनी उपाधियाँ दी कि उसके बर्दाश्त से बाहर हो गया| बोला वो एक शब्द नहीं| इतनी चिल्लाहट माँ के लिए घातक साबित हुई और वे वही गश खाकर गिर गयी|
उसके बाद अनिकेत था जिसने सब संभाला| नेह के पिता को सुचित करने से लेकर अस्पताल की दौड़| पिता के आने के बाद भी डॉक्टर के ये बताने कि माँ अब खतरे के बाहर हैं,अनिकेत घर गया| पिता ने देखा और महसूस भी किया | नेह पर गर्व भी हुआ कि उसने ऐसे सुयोग्य को पंसद किया|
आज नेह के जीवन का जो बसंत आया हैं, उसने नेह के जीवन को बसंती रंगो से ढांप लिया हैं| माँ की टांकी गोटा लगी बसंती साड़ी में लिपटी नेह,पिछले सारे फीके हो चुके बसंत में एक नया बसंती रंग भर रही हैं|
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें