द़रख्तो से झांकती रोशनी,
सा रहा सुकुन जिदंगी में,
उम्र जाया कर दी,
द़रख्तो को बड़ा करने में|

तन्हाईयाँ कुछ यूँ मयस्सर,
हुई मुझ पर,
अब तो भीड़ में भी,
तन्हाईयाँ ढुंढते हैं|

तन्हाईयों की परछाई कितनी लंबी और टिकी होती हैं,
ऐ जिदंगी की रोशनी आओ अपना आशियाना फैलाओ|

न आजमा जिदंगी इतना मुझे,
सांस भी साथ छोड़ने लगी हैं अब तो|

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