मनहरण घनाक्षरी
बीच धार नाव चली, सांझ से है नाता मेरा
प्रेम,प्यार, साथ की ये, अविरल धारा है।
नित नित विरह का, रुप है सजाता यह
नेह नातों का ही यह, खेल देखो सारा हैं।
सांझ भी छिटक रही, रात कोई गा रहा है
मन मेरा हार गया, दर्द का सहारा है।
गहरी नदी है इसे कौन नाप पाया कहो,
प्रीत प्रीत कह रही, मन से वो हारा है।
अंजू निगम
देहरादून
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