सुझाव

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गमलों के पौधे पानी पी ही रहे थे कि एक कम उम्र लड़का रद्दी बेचते हुये निकला। मुझे देख उसने साईकिल घुमा ली और बहुत तरीकें से पुछा," मैम, रद्दी हो तो दे दीजिये। आज आपसे ही बोहनी हो जायेगी।"
 अभी रद्दी बेचने का मेरा बिल्कुल मन नहीं था। पुरी रद्दी निकालो फिर पता चले मोल भाव पर बात अटक गयी। दोबारा रद्दी अंदर रखने की कवायद करो पर बच्चे की तहजीब देख उसे टालने का मन नहीं हुआ। जाने क्यों लगा हाल ही में कहीं यह चेहरा देखा है। कहाँ, याद नहीं आ रहा था।
  मोल भाव तय कर रद्दी ले आई। वह पेपर तौलने लगा। तभी एक पेपर पर मेरी नजर अटक गयी।
"अरे!!! यही तो है। कॉम्पिटिटिव इग्जाम में ऑल इंडिया रैंक बारह सौ पचास।" मैंने पेपर उसके आगे कर दिया।"तुम ही हो न!!"
उसका चेहरा देख लगा मानो किसी ने उसके घाव पर हाथ रख दिया हो।
"हाँ, पर क्या फायदा। इतनी फीस देना हमारे बस का नहीं।"
"फिर तो तुम्हें ठीक से जानकारी ही नहीं। आजकल तो आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के होनहार बच्चों को स्कालरशिप देती है सरकार। बस, तुम्हें पिता की सालाना आय का ब्यौरा देना पड़ेगा। नहीं तो ऐजुकेशन लोन ले सकते हो। सूद-ब्याज का भी चक्कर नहीं। तुम पता तो करो। तुम जैसे होनहार बच्चों को आगे बढ़ना ही चाहिए।" 
 सही जानकारी सही जगह पहुँच गयी थी। उसके चेहरे पर अद्धभुत आभा चमक रही थी। मेरा सुझाव उसका भविष्य बना दे, इससे ज्यादा सुकून क्या हो सकता था।

अंजू निगम
देहरादून

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