कर्ज

कर्ज

" दो शर्ट, दो पैंट, चार साड़ी। आठ कपड़े हुए मैडम।" दिनेश कपड़े गिनवाता बोला।
"साड़ी ठीक से प्रेस करना। पिछले बार तुने बिना तह खोले ही साड़ी दे दी थी।" नीता आगाह करती बोली।
"जी मैडम, रह गया होगा। मैडम, इस बार से साड़ी के दस रुपये लूँगा। सबने तो बहुत पहले से बढ़ा दिये है। मैने तो अब शुरु किया है।"
"एकदम से दो रुपये बढ़ा दिये!!! काम भी तो कर दस रुपये वाला। चल बढ़ा दूँगी पर साड़ी ठीक से प्रेस करना और शाम तक दे दियो कपड़े। टाइप फाइव वालों के तो फटाफट घर में कपड़े लेने-पहुँचाने जाता है। हमसे ज्यादा पैसे देते है क्या वे?"आज नीता ने सोच लिया था कि बात उठी है तो लगे हाथ यह बात भी दिनेश के कान में डाल ही दें।
"ला,तेरी डायरी। कपड़े लिख दूँ। पिछले बार दो कपड़े कम थे। दस दिन तक तूने चक्कर लगवाये ।" यह बोल नीता, दिनेश की डायरी उठाने लगी।
" अरे!!! बारह नंबर वाली सुधा मैडम का चार सौ रुपये बकाया है? इतनी उधारी पर चलती है तुझसे? टशन तो पूरा दिखाती है।" नीता एक पन्ने पर नजर गड़ाते कह रही थी।
" क्या बताये मैडम। जब पैसे लेने जाओ, तब अपने यहाँ किसी न किसी के बीमार होने की बात कह देती है और यह भी जता देती है कि उनका कितना पैसा इस बार भी बीमारी की भेंट चढ़ गया। कल भी उन्होंने यही बोल मुझे टरका दिया। उसके बाद न मेरी हिम्मत होती है पैसे माँगने की ,न वे देती है।" दिनेश की इस बात पर नीता की आँखे फैल गयी।
आगे नीता कुछ बोलती कि एक मोटर साईकिल वाला पास आ कर रुका," मैडम, यह बारह नंबर घर कौन सा है?"
"कौन सा बारह नंबर? टाइप फाइव या टाइप फोर?"नीता ने पुछा।
"टाइप फाइव....... सुधा सिंह का। "डिलवरी बॉय बोला।
"ये सामने है।" नीता सामने गेट दिखाते बोली।
 वे देख रहे थे डिलवरी बॉय के बैग से निकल रहे पिज्जा के चार बड़े डिब्बों को। डायरी के पन्ने फड़फड़ा रहे थे।

अंजू निगम
देहरादून

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