दान

दान

वार्ड के सीधे हाथ की तरफ पड़े तीसरे बेड पर माँ बेटे का जोड़ा लाचार सा बैठा है। माँ कैंसर की आखिरी स्टेज पर, मेरे पापा की तरह और बेटा आंशिक रुप से ही देख पाता है। सुना जहाँ माँ काम करती थी, वही लोग यहाँ भर्ती करवा गये। दोबारा खबर नहीं ली। शायद अस्पताल के खर्च की सोच भारी हो गयी होगी।
     इस वार्ड का हर अजनबी अपना है, वह क्पा है न कि अपनों ने तो कब का अजनबी कर दिया !!! अजीब बात है न, यहाँ जीवन तिल तिल होम हो रहा है और उस जीवन के साथ बंधे हम एक दूसरे में जीवन खोज रहे हैं। 
 उस माँ को अपने से ज्यादा बच्चें की चिंता है। उसके बाद कौन? शायद उसकी साँसे अब तक इसी वजह से अटकी है। हंलाकि अस्पताल की "सपोर्ट टीम" ने उनका सारा भार ले लिया है। मगर यह इंतजाम माँ के जीवन तक है।
   पापा को भी क्या आज, मेरी बाबत, इसी बात की बैचेनी है या कुछ अहसास सा हो गया है उन्हें। कुछ कह रहे हैं जिसे सुनने के लिये मुझे अपने कान उनके मुँह तक सटाने पड़े है।
"बेटा, अब बस!! समय ..... हो गया। मेरे बाद....... मेरी आँखे।" कह बिस्तर के नीचे से कुछ पेपर निकाल मुझे थमा देते है। मेरे हाथ पर रखा उनका हाथ कुछ बताता है और धीरे धीरे उसमें जीवन सूख जाता है।
पापा के हाथ से भरा फार्म है, अपनी आँखे दान करने का। पापा की आँखे खुली मेरी ओर एकटक देख रही है, शायद एक आश्वासन के लिए। मेरे हाथ एक नंबर मिलाने लगते है।
  वह लड़का अब मेरे साथ रहता है और साथ रहती है उसकी दो आँखे।

अंजू निगम
देहरादून

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