चाँदनी

चाँदनी


"माधव, मुझे यहाँ टाइम लग जायेगा। झांसी वाले फुफाजी की ट्रेन लेट हो गई है। टिप्पो को भी  साथ ही लेता आँऊगा। आगे पीछे ही आयेगीं दोनों की ट्रेन।" नवीन ने कहा।
अरे भैया!!! मैंने कहा था ओलॉ कर लेगें दोनों। यहाँ अकेला मैं, क्या क्या देखूँ।" माधव परेशान सा बोला।
" झांसी वाले फुफाजी को तो जानते हो न!! अरे, फुफाजी से याद आया। अभी कैटरर वाला गद्दे पहुँचवा रहा है। चालीस बोले थे। गिनवा लेना और चाँदनी,गिलाफ देख लेना। साफ हो तभी रखवाना, नहीं वापस भेज दूसरे मँगवा लेना। झांसी वाले फुफाजी तो हाथ में सरसों नहीं उगने देते । तुम बस ये कर लेना, बाकी मैं आकर देख लूँगा।"
तभी गद्दे लिये मजदूर आ गये। गद्दे तो ठीक लगे पर चाँदनी एकदम उजाड़ ,भिजवा दी थी। काम ने वैसे ही माधव के दिमाग में गर्मी भर दी थी ,यह गर्मी उसने कैटरर को खरी खरी सुना कर उतारी।
सारी चाँदनी जस की तस वापस भेज दी गई , जो नयी आयी वे झक सफेद। चाँदनी के उजास से कमरा चमक सा गया।
फुफाजी आये तो खुश दिखे।
"भई, इंतजाम तो तगड़ा है। गंदगी मुझे जरा पंसद नहीं। इस बार तो सोच कर आया था, कुछ ऐसा-वैसा रहा तो होटल ले लूँगा।" फुफाजी एहसान से दबाये जा रहे थे।
घर के दामाद का रोल वे बखूबी निभा रहे थे। शाम को शगुन ले जाने की हड़बड़ी शुरु हुई। सब अपनी तैयारियों में लगे और फुफाजी की सेवा में कुछ नरमाई आ गई।
  ऊपर से नीचे तक चमक रहे फुफाजी को जूतोंं की चमक कुछ फीकी लगी और सफाईपंसद फुफाजी ने वहीं बिछी लकदक चाँदनी का कोना खींच अपने जूते चमका लिये।
उजली चाँदनी में एक काला धब्बा चिपक गया।

अंजू निगम
देहरादून

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