) कार्ड
गोधुली उतर आयी थी जब नेहा घर पहुँची।
थके कदमों के साथ वह अपने कमरे की ओर बढ़ गयी। मेज पर अपना पर्स रखने को बढ़ी तो एक निमंत्रण पत्र चमक उठा।
"दीपेश संग नीला"।
"मेरा दीपु शादी कर रहा है और मुझे कुछ पता ही नहीं? सब कुछ अपने आप तय कर लिया!! शादी का कार्ड तक छप गया। बेवकूफ तो मैं ही थी जो इसी दीपेश को पैरों पर खड़ा करने के लिए अपना जीवन होम कर दिया।" अपनों के घात से आहत नेहा निढाल हो वहींं रखी कुर्सी पर ढह गयी।
कार्ड को खोल कर देखने की उसकी इच्छा मर गयी। उसकी नजरें काँच की अलमारी के ऊपरी सेल्फ को टटोलने लगी। "नीलेश की शादी का कार्ड वहींं कहीं रखा होगा !!! गलती तो मेरी हीक थी, नीलेश ने तो हमेशा साथ देने की कोशिश की थी। तब वह दीपेश के मोह में जकड़ी रही और उस निर्मोही को जऱा अहसास न हुआ कि बड़ी बहन घर बैठी है और वह अपना सेहरा बंधवा रहा है।"विचारों में उलझी वह बैठी ही रहती अगर दीपेश आ उसके कंधों पर हाथ न रखता।
"दी आज इन्हें भी पकड़ लाया।" कह उसने नीलेश को आगे कर दिया। कार्ड का कोई प्रंसग उसने न उठाया।
" दी किसे कहते हो? तुम तो बड़े हो गये हो। सारे फैसले खुद ले सकते हो और इन्हें तकलीफ देने की क्या जरूरत हुई? वह हक तो मैं खो चुकी हूँ।"दीपेश को आढ़े हाथों लेते नेहा बोली।
फिर एक ठहराव के साथ नीलेश से बोली, "आपको शादी की बधाई।"
"शादी तो हुई नहीं।"नीलेश भी उसी ठहराव.के साथ बोला।
"फिर वह कार्ड?" नेहा चौंकते हुये बोली।
"दूसरी शादी कैसे कर सकता था।"
"दूसरी? पहली किसके साथ हुई?" नेहा उलझते हुये बोली।
"तुम्हें ही तो पत्नी बनाने का वचन लिया था।" नीलेश के चेहरे पर मुस्कान फैली थी।
"तो कार्ड"?
"बस, कार्ड ही छपे। मुझे लगा कि मैं उस लड़की के साथ न्याय नहीं कर पाऊँगा।"नीलेश अब गंभीर था।
" दी, अब ज्यादा विचार न करो। थाम लो जीजाजी का हाथ।"
"तु तो चुप रह। अपनी शादी तय कर आया और अब दी को समझाने में लगा है।"
" एक ही कार्ड छपवाया है दी। वो भी लिफाफा। अंदर तो जैसा आप कहेगी, वैसा लिखा जायेगा।"
"अगर मैं तुम्हारी शादी के लिए हामी न दूँ तो?"नेहा बोली।
"तो फिर हम भी वचन देते हैंं कि जब तक आपकी हाँ नहीं होगी लिफाफे के अंदर कुछ नहीं लिखा जायेगा।" दीपेश गंभीर था।
"तुमने अपनी सारी जिम्मेदारी पूटंरी की नेहा। अब दीपेश की यह जिम्मेदारी भी पूरी करो।" नीलेश ने हल्के से कहा।
नेहा माँ की तस्वीर के आगे जा खड़ी हुई।"माँ से आर्शीवाद ले ले।" दीपेश का हाथ पकड़ नेहा ने माँ की तस्वीर के आगे खड़ा कर दिया। दीपेश ने नीलेश का हाथ थाम नेहा के हाथ पर रख दिया।
"आप दोनों भी अब माँ का आर्शीवाद ले ही लीजिए।" दीपेश मुस्कुराते हुये बोला।
"आप दोनों एक बात बताईये। यह केवल लिफाफा छपवाने का विचार किसका था?"नेहा ने दोनों को देखते हुये कहा।
जवाब में नीलेश दीपेश की ओर देख मुस्कुरा दिया।
अंजू निगम
देहरादून
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