घर
वो "डुप्लेक्स हाउस" हैं| इसको बनवाने में शर्मा जी ने अपनी पूंजी और सारे अनुभव पिरो दिये| आज गृह प्रवेश है| सफेद बल्ब की लड़ियाँ मकान को जैसे चाँद सी रोशनी में नहला रही हो| घर का अंदर गेंदे और गुलाब की पखुड़ियो से गमक रहा हैं|
आंनद को भी शाम का न्योता है| एक कसक उसके मस्तिष्क को मथ रही है| इतने घर जैसे संबध थे और न्योता केवल उसके नाम का| पैसो ने एक फांस बना ही ली| उसका मन उखड़ गया था पर पत्नी ने ही ठेला," यूँ जरा सी बात में रिश्ते मत बिगाड़ो!"पत्नी की इसी समझदारी ने घर को एक धागे में बांध रखा है वरना उसके परिवार के मोती कब के बिखर गये होते|
घर का ऐश्वर्य आनंद को अपनी ओर खींचे जा रहा था| काश वो भी ऐसा कुछ सुमि को पकड़ा पाता,उसकी सारी जिदंगी तो कतर-ब्योत में ही निकल गयी|
सामने से शर्मा जी ने आंनद का खुली बाँहो से स्वागत किया|
"भाभीजी और बच्चे कहाँ है?"आंनद पूछ बैठा|
"हाँ,अभी मिलवाता हूँ|°कह शर्मा जी उसे ले लॉन में आ गये| लॉन में मानो रईसी बिखरी जा रही थी| आंनद सकुचा उठा|
मिसेज शर्मा के हाव-भाव से अमीरी टपक रही थी|
"सरला,ये आंनद!! हमारे पड़ोसी थे पहले!!"शर्माजी अपनेपन से बोले|
"हाँ याद है| दो कमरे वाले घर में न !!आप सब खाना-पीना ठीक से लीजिएगा| यू नो,बाहर से शेफ बुलाये है|"कह सरला जी का मंहगे परफ्यूम से भीगा आंचल सर्र से शर्मा जी के पास से निकल गया|
बच्चो के नाम पर हाई स्पाईक बनाये हाय हैलो करते टिटहरी से दो युवक|
आंनद अमीरी के दो कौर मुँह में डाल घर आ गया| अच्छा लगा कि उसे अकेले ही बुलाया गया|
"कैसा लगा घर? "पत्नी का प्रश्न आया|
"हमारे "घर" से बहुत छोटा" आंनद ने सुकून की सांस लेते हुये कहा|
अंजू निगम
देहरादून
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