उऋण

उऋण

"हाय हाय, लल्ला की अम्मा!!! पोते की बधाइयां तो लेती जा| पोता आया है, इस बार दो सौ रुपली से बात न बनने की| हजार का पत्ता ढीला करो अम्मा हाँ|इससे कम में तो हम न मानती|"
" गाओ रे सब" हीरा बाई ने जो हांक लगायी तो सारे किन्नर" सज रही गली  मेरी माँ चुनर गोटे में" में झुमने लगे| हीरा बाई की जैसी भारी आवाज, वैसा भारी भरकम शरीर| जिस दरवाजे खड़ी होती, मनमाना वसूलती|
  "दो रे अम्मा,दादी बनी हो| जल्दी पैसे थमाओ |तेरे पोते की नजर उतारे| लल्ला लाखो में एक रहे| घर तेरा आबाद रहे|"
  उसकी माँग पर अम्मा हुलस उठी,"हीरा बाई, घर देख कर बात कर| हमारा घर इत्ता नहीं भरा| तु तो हमारे महीने का राशन बांधवा रही है| चल, पाँच सौ ले और बच्चे की नजर उतार| पर हीरा बाई अड़ी रही| अम्मा की अंटी से हजार ढीले हुये और रमेश महीने तक बरकत बरतने की सोचने लगा|
"काहे अम्मा इतना पकड़ा रही हो|अपना तो पूरा पड़ता नहीं|"
 अम्मा वैसे ही घायल बैठी थी| रमेश की टोक से चिढ़ उठी,"चुप रह निगोड़े!! किन्नरों की बद्दुआ बड़ी बलवान होवे है| इनकी नेमत बरसी और बच्चे का भाग जगा तो घर फिर से भर जायेगा|"
  अम्मा की बात को फेरना रमेश के कद के बाहर की बात थी| लेकिन तभी से हीरा बाई रमेश की आँखो में किरकिरी की तरह आ धंसी|
   इधर एक और विष धीरे धीरे हवा में अपने पैर पसार रहा था| विष ने सबको घरो में सख्ती से कैद कर दिया| सारी जगह लॉकडाउन!! एक हफ्ते में ही फैक्ट्री मालिक ने नोटिस भेज दिया| वैसे भी दिहाड़ी मजूरी से ज्यादा की उसकी आमदनी थी नहीं| आज वो भी गई!!! फांको की नौबत थी|
   आज वही हीरा बाई उसके दरवाजे खड़ी थी| पूरे महीने के राशन के साथ| रमेश का मन और कद बहुत छोटा हो गया| उसके कुछ कहने से पहले ही हीरा बाई अगले घर की ओर बढ़ गयी|
  साथ वाला किन्नर बोल उठा," आज हीरा बाई ने तुम्हें उऋण कर  ही दिया|"

अंजू निगम
देहरादून

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