आपदा
लॉकडाउन लगने के बाद आज तीसरी बार किशन रेलवे प्लेटफार्म पर खड़ा था| दो बार पहले खुब शोर उठा और भीड़ के रेले के साथ वो भी यहाँ तक अपने को खींच लाया था पर सिवाय मजबूरी में लिपटे चेहरो को देखने के उसके हाथ कुछ न लगा| इस बार हजार पुछताछ के बीच ,वो सवेरे चार बजे से ही यहाँ बन आया था|
रजिस्ट्रेशन करवा वो लाइन में आकर बैठ गया|पैर मन भर के हो रहे थे, पर आँखो में आशा के दीप टिमटिमाने लगे थे| अम्मा-बाऊजी, छुटकी, मेहरारू सब आँखो के सामने घुमते रहे| परिवार का इकलौता लड़का ,यहाँ दूर परदेस में दो पैसे कमा लेने को ही तो टिका था| इस महामारी ने वो सहारा छुड़ा दिया तो मन अपनो के पास जाने को उड़ चला|
उससे दो आदमी पीछे, तेज पसीने से गंधाते कपड़ो में "वो" बैठा था| आँखे अंदर धंसी जा रही थी और बाल एकदम उजड़े| उसकी आँखो में पसरी तीखी बेचारगी ने ही किशना का ध्यान उसकी ओर किया|
"कौन गाँव के हो"? किशना ने गुहारा|
"हम गाँव पुरवा, तहसील मलीहाबाद, जिला लखनऊ के भैया हो|"अपनी तरफ की बोली सुन उसकी जुबान में ताकत भर गयी|
"अरे!!!तो हमऊ ढेंढेंमऊ के हैं| पुरवा के बगलई में तो रहा|"
" अरे ऊँहा तो हमाय बहिन बियाही हैं|रमेशी काका के ईहा| आप तो हमाय मान के हुये|"
मन और रिश्ते दोनो जूड़ गये| बाते चौड़ी होती गई| पता लगा उसका बूढ़ा बापू खटिया से लग गया है| बात आज कल की है| छगवा की बाट जोह रहे| बूढ़ी अम्मा सेवा में लगी है| गाँव वालो की थोड़ी मदद हो जाती है| मेहरारू तो पहले ही स्वर्ग का रास्ता ले ली|
किशन को छगवा ज्यादा मजबूर लगा| खुद से ज्यादा| ट्रेन आ चुकी थी| और प्लेटफार्म तक लगते खचाखच भर गयी थी|
"भैया, रजिस्ट्रेशन करवा लिये हो न!!"
" कैसे करवाई भैया,हमाय पास त मोबाइल हईयो नहीं|"छगवा की आवाज डुबने लगी|
"फिर तोहार जाना कैसे होई?"
किशना ने छगवा की मजबूरी गिनी और बोल उठा," अब तो तुम हमाय रिश्तेदारी में हो| गाँव भी उसी रास्ते पड़ेगा | चले आओ साथ ही| आगे जो हुई साथ देखा जाई|" कह किशना छगवा को साथ लिए ट्रेन की ओर बढ़ गया|
आज इस मरे शहर में एक इंसान फिर से जिंदा हो उठा था|
अंजू निगम
देहरादून
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