कीटाणु

कीटाणु


"दूर खड़े होकर बात करो मुझसे। कहीं तुम्हारा जहर मुझमें भी न भर जाये।" हवा ने घृणा से कीटाणु की ओर से मुँह फेरते कहा।
" तुम्हें ही तो माध्यम बना मैं हर कहीं पहुँच पाया हूँ।" विषाक्त हँसी हँसते कीटाणु बोला।
" तुम्हारी वजह से मेरा अस्तित्व खतरे में आ गया है। मनुष्य  मुझसे डरने लगा है।" हवा दुखी होते बोली।
" मुझे दोष मत दो। मैं तो आराम से सोया हुआ था। तुम्हें जिस मनुष्य के प्रति हमदर्दी हो रही है, उसी ने मुझे नींद से जगाया।" कीटाणु ने सच रखा।
" वातावरण को तो तुमने ही विषाक्त किया। तुमने ही मुझको जहरीला बना दिया।" हवा का दुःख चरम पर था।
"तुम कौन से संसार में रहती हो? मेरे आने के बहुत पहले ही इस मनुष्य ने वाहनों और कारखानों का विषाक्त धुंआ छोड़ तुम्हारा दम घोंंटा है। शुक्र मनाओ मेरा कि मेरी वजह से ही मनुष्य एक जगह बंध कर बैठा है। अब तुम ढंग से सांस ले पा रही हो।" कीटाणु ने हवा को  समझाया।
" चलो माना तुम ठीक बोल रहे हो पर तुमने भी तो मुझे कम विषाक्त नहीं किया।" हवा ने तर्क रखा।
" सब ठीक हो जायेगा अगर मनुष्य सही तरीके से जीना सीख जाये। तुम मनुष्य के बारे में इतना सोच रही हो,वह भी तो सोचे तुम्हारे बारे में!! अगर मनुष्य अपने दिमाग में पल रहे सबसे जहरीले कीटाणु को मार देगा तो हम सब तो वैसे ही खत्म हो जायेगे। तुम मनुष्य तक  यह संदेश पहुँचा दो और साफ, स्वस्थ बहो।" यह कहता कीटाणु हवा में ही विलीन हो गया।

अंजू निगम
देहरादून

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