धुंध

धुंध


"शगुफ्ता!!शगुफ्ता!!" घर के अंदर से बाहर दहलीज़ तक फरीदा की आवाज गुँज गयी।
"जा, निगोड़ी, अम्मी आवाज दे रही है।" दहलीज पर बैठी बड़ी अम्मी शगु को घुड़क कर बोली।
"बड़ी अम्मी, आज आप बचा लो। कह देना दो पान की गिलोरी तुलवाने गयी थी। मैंने ही चौक तक भेजा था। नहीं तो आज अम्मी कहर बरपा देगी।" शगु के मन में खौफ उतर गया था।
"आय!! हाय!!मुझसे झुठ बुलवाती है। कीड़े पड़े तुझे। ये कुफ्र है। अल्लाह के कहर से डर निगोड़ी।" बड़ी अम्मी के तेवर आज जरा़ नीचे नहीं हो रहे थे।
"बस,आज कह दो। कल से बाहर कदम न रखुँगी।"शगु अब मान-मनौव्वल पर उतरी।
"तु ही बता, सारे दिन यहाँ से वहाँ लहराती रहती है। ज़रा अपनी अम्मी के दो चार काम पकड़ लिया कर। उसके शरीर को भी आराम मिले"। बड़ी अम्मी समझाइश पर उतरी।
"मैं क्या करुँ बड़ी अम्मी, रुखसाना का तो मेरे बिना एक काम न सुलटता और फिर हमिदा आपा तो है  अम्मी की मदद को।"शगु का पलट कर जवाब आना बड़ी अम्मी को नागवार गुजरा।
"जमीन से डेढ़ फुट है और जुबान गज भर लंबी । जा, न देती अम्मी को तेरी तरफ की सफाई।" कह बड़ी अम्मी मुँह फेर बैठ गयी।
शगुफ्ता ने सिर उठा कुछ और जवाब देना चाहा। कहाँ थी बड़ी अम्मी!!!! वह दिन तो पुरानी यादों की तहों में खो गये थे। अब न बड़ी अम्मी की रुसवाई थी, न अम्मी।  आँखो पर छायी धुंध ने सब ढक दिया था।

अंजू निगम
देहरादून



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