योगा
फ्रिज का दरवाजा खोले खड़ी हूँ,सोच रही हूँ कि क्या निकालने आयी थी!!!ऊपर से नीचे तक झांक लिया पर जब बात बनी नहीं तो दुबारा रसोई के पैर फेरे|तब याद आया,"ओह..... ये तो जरूरी था फ्रिज से निकालना!!"
मेरी इस हालत पर पति खुब चुटकी लेते,"किसी दिन मुझे न भूल जाना|शाम को आँऊ और आप कहे कि"माफ कीजिए आप गल्त घर में आ गये है|"
मैं खुद परेशान थी|उस दिन जब"मॉल"में खरीदारी करने गयी,वापस आने पर कार कहाँ "पार्क"की,याद नहीं आया|थोड़ी आगे लाल.रंग की "वैगन R" दिखी तो जान में जान आयी|चटपट चाबी निकाल कार का दरवाजा खोलना चाहा तो वो खुले नहीं|कुछ दूर खड़े एक साहब मेरी हरकत देख रहे थे|पास आ बोले,"जरा किनारे हटेगी"?
"हाँ-हाँ क्यों नहीं!"मन ही मन खुश|भले इंसान मदद करने चले आये|
उन्होंने जेब से चाबी निकाल'की होल' में डाली और दरवाजा खोल दिया|
"अरे वाह!!!आपने दरवाजा खोल दिया|मुझसे तो खुल ही नहीं रहा था|"मैं चहक उठी|
"शायद इसलिए की ये मेरी कार हैं|"वो महोदय इत्मीनान से बोले|
"आपकी कार!!!"मैं सकपका गयी|
"जी"वे शरारती मुस्कान चढ़ाये बोले|
मुझे यकीन न हुआ|मैंने सीट कवर देखा|और अपनी अक्ल को सराहा क्योंकि सीट कवर मुझे याद था|
वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे|और मैं........"अरे!!!ये तो कमाल हो गया न!!!"कह तेजी से वहाँ से खिसक लेने में भलाई समझी|
कार में नंबर प्लेट भी होती है!!ये बात मुझे बाद में याद आयी|
हद तब हूई जब एक काव्य गोष्ठी में मैं आमत्रिंत थी|भूलने की आदत के चलते कविता भी पन्नो पर उकेर दी|सब ठीक चल रहा था कि ऐन वक्त संचालक महोदय का नाम भूल गयी|सोने पर सुहागा वहाँ बैठे किसी के नाम मेरे जेहन पर चढ़े ही नहीं|संचालकजी ने स्थिति संभाल ली पर फजीहत तो हूई ही|
घर आ पति ने राय दी,"सुबह की सैर शुरू करो|हो सके तो योगा|मन शांत रहेगा|"
कल से "योगाभ्यास"शुरु कर दिया है|परिणाम जल्दी पता चलेगा|
अंजू निगम
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