डोर जो बंधी है

डोर जो बंधी है

दरवाजा लगातार पीटे जाने पर खीझ भी चढ़ आयी। 
"कौन है?" मन की खीझ आवाज को तल्ख बना गयी।
"मैं हूँ ,मन्नी। जल्दी खोल, बाहर बहुत गर्मी गिर रही है।"
कनु ने दरवाजा खोला। मन्नी आ, पास पड़े पंलग के सिरहाने धंस गयी। कनु ने उसका हाल देखा तो जल्दी से शरबत बना लायी। शरबत पकड़ा कनु वहीं सिरहाने की थोड़ी सी बची जगह में अपने को टिकाने लगी। ये महसूस कर मन्नी पल्ली तरफ खिसक गयी।
" तकलीफ होती है न,ऐसी थोड़ी सी छुटी जगह में अपने को निभाना।" 
मन्नी की इस बात पर कनु ने उसे ध्यान से देखा। मन्नी के माथे पर गाढ़े पसीने की बूँदे अब भी चिपकी थी। आँखे एकदम सूखी मानो रेगिस्तान उतर आया हो।
"क्या कहा पंडित जी ने?" कनु ने बातों को मोड़ दिया।
मन्नी चेहरा उठा देर तक उसे देखती रही,एकटक। मानो शब्दों को एक जगह बटोर रही हो।
" कह रहे थे, अब कुछ नहीं बदलेगा। जैसा है वैसा ही रहेगा। वो कभी तुम्हारी तरफ नहीं मुड़ेगा।"
"ऐसा ही होगा, तुम्हें विश्वास है?"
" सब तरफ के विश्वास की डोर तो छुट गयी। तभी एक इसी तरफ का विश्वास ज्यादा हो गया है।"
"तुम चाहो तो ये विश्वास भी तोड़ सकती हो। बस, अपने अंदर के विश्वास को बढ़ाओ। बाकी सब बेमानी हो जायेगा।"
"तुम्हें लगता है, मैं ऐसा कर पाऊँगी? मैं बहुत हार गयी हूँ। एक बेटी का सुख था ,वो भी छिटक गया।"
"क्यों करती हो ऐसा"?
कनु का ये प्रश्न मन्नी को बिंध गया।
"क्या करती हूँ?कैसा करती हूँ?" मन्नी अचकचा गई।
"ये जो अपने को कमजोर दिखाती रहती हो।इतनी कमजोर हो क्या तुम?" आज बाहर की गर्मी कनु की आवाज में चढ़ रही थी। "मेरे साथ कौन था? मैं भी तुम्हारी तरह कमजोर, लाचार बनी रहती। बटोरती सबकी खोखली सहानुभूतियाँ। यही चाहती हो न बस तुम।" कनु का स्वर तल्ख और कठोर था।
मन्नी चौंक कर ही  उसे देखती है। एकटक। इस बार फिर वो बटोर रही है, शब्दों को नहीं अपने आप को।
"बंद करो अपने आपको बेचारा मान कर जीना। दूसरों के फेंके दया के टुकड़ो से कब तक अपने मन को बहलाती रहोगी।"कनु आज जो लावा उगल रही है, वो मन्नी के इस हद तक लाचार होकर जीने का नतीजा है। मन्नी की ऊँची डिग्रियां अलमारी के कोने में सुबक रही है। कनु नहीं चाहती कि उसकी बहन कही से भी कमजोर पड़े। फिर उस आदमी के लिए क्यों जिसने मन्नी को कभी कीमती माना ही नहीं। मन्नी तो हीरा है। उसे तराशना है तो शब्दों की कठोर चोट तो करनी ही पड़ेगी न!!"
मन्नी यूँ ही हतप्रभ बैठी रही। आज कनु ने उसे सहलाने की कोशिश नहीं की। मन्नी सारा समय अपने आप से लड़ती रही। क्या सब केवल तमाशा देखने के लिए उसके मर्म को छेड़ते है। कनु की बाते कठोर है पर सच के करीब।
वो धीरे से चलती कनु के पास आकर बैठ जाती है।"कल चलोगी मेरे साथ, मेरे पुराने स्कूल। देखुँ मेरी जगह अब भी खाली है क्या?" कनु को लगा कि वो आत्मविश्वास की डोर जो मन्नी के हाथों से छुट रही थी, अब उसका सिरा फिर मजबूती पकड़ रहा है।"  

अंजू निगम
देहरादून





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