बरखा
बरखा
बरखा की बूँदो ने जब भी
फैलाया था अपना आंचल
और जब बिखर रहे थे रंग
मेंहदी के ,मेरे मन के आँगन में
तब लगा जैसे याद किया तुमने
रह रह कर जब थाप पड़ी
मुंडेरो पर या सांस लेती
खिड़की की झिर्रियों पर
या यूँ ही खुले दरवाजो की
दहलीजों पर
तब लगा जैसे याद किया तुमने
चमकी जब हिचकी आसमाँ में
या घुमड़ उठे यादों के बादल
जब भीगी धरती आँखो की
या घुल घुल जाते वादो की
गीली मिट्टी में धंस चले वक्त की
तब लगा जैसे याद किया तुमने
इस बारिश में जब सजी रही
चारो ओर बूँदो की महफिल
और धरा में बिखरा हरापन
जब बही कागज की कश्तियाँ
या नहा चुकी हरे पत्तों की लड़ियाँ
तब लगा जैसे याद किया तुमने।
बारिश जब अपने को लायेगी हर साल
तब हमेशा लगेगा जैसे याद किया तुमने।
अंजू निगम
देहरादून
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