मजदूर

मजदूर


अरे मजदूर!!

धूप की आरी,बन रही कटारी
जलते पाँव जेठ की दुपहरी।

पत्थर तोड़ता सड़क किनारे
होता मजदूर बहुत मजबूर रे

कांधो पर बोझा जो लाद रहे 
गरीबी और लाचारी को सहे

नेता तो खींचे योजनाओं का खाका
इनका दर्द आज कौन समझ रहा


जिनके कान सुनते पैसों की खनक
उनको लग पायेगी बेबसी की भनक

 कुचल कर इनको जो हो रहे अमीर
क्या बदल पायेगे इनकी तकदीर?

उठो मजदूर, न बनो अब मजबूर
माँगो हक ,बदलो माथे की लकीर

रख लो तुम नये भारत की नींव
करके तुम अपने सपने सजीव।

अंजू निगम



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