खानदान

खानदान
   
मिंया का ये तीसरा ठिकाना था|वो संकरी गली कुछ ज्यादा अजीम थी उन्हे| जिस मकान से रूबरू हुये|वो खस्ताहाल था|लाहौरी ईटों की महीन चिनाई थी,तभी दीवारे अभी तक टिकी थी|पुताई की खाल उसके जिस्म से जगह जगह अलग हो गई थी|
     मिंया के सिर पर छत थी यही माकूल बात थी|छत भी क्या थी,उखड़ता पलास्तर सरियो का कंकाल दिखा रहा था| बेगम चुप ही रहती,तब तक जब तक रसोई के चुल्हे में आग जलती रहती|
   मिंया थे खानदानी|जाहिर सी बात थी खाने और पीने का शौक रखते थे|जो कभी आमदनी होती,आधी उनके शौक पर खर्च हो जाती|शौक तो मिंया शायरी का भी रखते थे और उनकी कलम बेहतरीन नज्में बनाती|पर खालिस उर्दू में लिखी रूबाईयाँ, मतले केवल मुशायरो तक ठहर गये|न वे कान रहे,न वे शौकीन|नतीजन उनका रूतबा कम होते-होते गुमशुदा सा हो गया|
   कभी कही से एकमुश्त रकम आती तो बहार थी|
    बेगम इस लाचारी से अजीज आ चुकी थी|"खानदानी"ठप्पा लगा था,तो कोई और काम पकड़ना मिंया की शान के खिलाफ जाता|
    उस दिन दो हिज्जो कख फांका हो गया पर मिंयख की पेशानी पर कोई सलवटे नहीं|बेगम ने कुछ तय किया और अपनी सहेली के यहाँ से सिलाई मशीन माँग लाई|कह सुन दो-चार काम  हाथ में लिये|बेगम के हाथ में महर बरस रही थी| उनके सिले कपड़ो से उनका काम बोलता था|चर्चे तो होने थे और हुये|
     आज हालात कुछ इस कदर जुदा हैं कि बेगम की खुली है सिलाई की दुकान और मिंया ढु़ढ रहे अपने मुकाम|होंठ उनके बुदबुदाते है ः-
     मेहरबां होकर मुझे बुला लो चाहे जिस वक्त,
    मैं गया वक्त नहीं कि फिर आ न सकुं|
            ★अंजू निगम

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