मेरे पास समय है
माँ,तेरे पास समय था हमारी हर बात के लिए,
काम अनगिनत थे,पर फिर भी तेरे पास समय था|
पर हम क्यों छिटक गये थे,उलझ कर अपने आप में|
कह कहाँ पाये जो महसूस होता था,
कहाँ जता भी पाये कभी कि तेरा होना भर हमें अच्छा लगता है,
रह गया कितना कुछ अनकहा, अबूझा सा|
हाँ माँ,मुझे महसूस होती थी सर्दियों की कुनकुनी धूप में तेरे आँचल की गरमाहट,
अच्छा लगता था रोटी बेलते तेरे हाथो में लाल चुड़ियों का खनकना,
तेरे बनाये खाने को दोस्तो का चट कर जाना और देर तक उसकी तारीफ सुनना मुझे अच्छा लगता था|
जानबूझकर आँखो को मूँद जब मैं लेट जाती थी तब अपने बालो पर तेरी उगलियों का स्पर्श अच्छा लगता था|
मुझे अच्छा लगता था तेरा आस-पास बने रहना|
तेरे लंबे बालो,माथे की गोल बड़ी लाल बिंदी देखना भाता था मुझे|
पर क्यों अंजान रही तेरी उगलियों के कपंन से,
क्यों अनदेखा रहा तेरे लंबे बालो का सिमटना,
माथे की गोल बिंदी के पास घनी होती सिलवटो से क्यों अंजान रही मैं|
हमने केवल तेरा वक्त चाहा,कभी अपना वक्त तुझे नहीं सौंपा|
तु मुस्कुराती,अंजान सी बनी रही,
आज जिदंगी ने मुझे भी उसी मोड़ पर खड़ा किया है,
आज मैं भी "माँ" हूँ,
आज मेरे पास भी समय है,
पर क्या.................??
अंजू निगम
इंदौर
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें