सुरक्षा कवच
सुबह के आठ बज रहे हैं| मौसम में ठंडक सी घुल आयी हैं| माहौल नीरवता में पटा हैं|
महानगर का फैलाव लोगो के दिमाग में भी उतर आया हैं| सामने रहने वाले लोग एक दूसरे को नहीं जानते|उन्नाव में तो जैसे पूरा शहर एक दूसरे को जानता है| गमी हो या खुशी| सब आपस में बंटती थी| माँ का इस रसहीन शहर में मन नहीं लगता| एक समय था जब माँ ने बीस पच्चीस लोगो के कुनबे को एक छत के नीचे साँस लेते देखा हैं| न वे लोगो के मन में पल रहे जहर को समझ पाती हैं| इसीलिए अकेले छोड़ते विभोर का मन और सहमता हैं|
एक......दो.....तीन बार बंद होते दरवाजे का इंटर लॉक इस नीरवता को भंग कर रहे है| दरवाजे में बनी ऊपर, बीच की और नीचे की सांकलो में ताले जड़ने के बाद, दो बार पीछे धकेल कर और दो बार आगे खींच कर वो जड़े हुये तालो की जड़ो का इत्मीनान करता है|
गैलरी में अभी भी हल्का बल्ब जल रहा हैं|
लिफ्ट से नीचे जाता विभोर माँ को सुरक्षा के इस कड़े घेरे में बाँध निश्चित सा होता हैं| दो काम वालियों को भी शाम तक आने की ताकीद कर वो इस कवच को और मजबूत बनाता है|
"माँ, मैं ऑफिस हो आऊँ?तुम थोड़ी देर के लिए अकेली रह पाओगी| खाना-पानी मेज पर ही रख जाऊँगा| आपको किचन तक नहीं जाना पड़ेगा| " विभोर माँ से एक आश्वासन चाहता है|
" हो आओ तुम| हो सके तो तनेजा भाभी को आने के लिए कह देना|" माँ विभोर को थोड़ी तसल्ली देना चाहती हैं|
"तनेजा आँटी तो बेटी के पास गई हैं हफ्ते भर के लिए| वो होती तो मुझे इत्मीनान रहता| कम्मो और सोनी पर मुझे जरा भरोसा नहीं| काम से ज्यादा मुँह चलता हैं|"विभोर थोड़ा रोष में बोला|
"फिर रहने दे| बाहर से ताला लगा जा| दिन भर सेल्स मैन आते रहते हैं| कहाँ तक दरवाजा खोलने उठुँ|"
माँ की ये बात सुन विभोर के चेहरे पर चिंता की गहरी रेखा खिंच जाती है|
माँ का अकेलापन ,माँ की कमजोर देह और शहर में बढ़ चुके क्राईम ने एक अजीब दहशत उसके मन में भर दी हैं |
"बस, दो दिन की और बात हैं फिर तो अनुभा आ ही जायेगी| कम से कम वो माँ की ओर से निश्चित रह पायेगा|" वो मन ही मन हिसाब लगाता हैं| कल ही अनूभा से बात हुयी थी|
"तुम कब तक आ रही हो अनूभा?तुम्हारे बिना घर और मैं दोनो अस्त-व्यस्त हो जाते है|"विभोर की आवाज में स्नेह छलक रहा था|
"रहने दो| तुम्हें कब मेरी जरूरत पड़ी| घर का काम ही नहीं संभल पा रह होगा| जानती हूँ तुम्हारे सारे चोचले|" अनुभा की आवाज में अभी भी वही तिक्तता घुली थी|
दफ्तर के लिये निकलते समय उसके मन में एक हल्की चिंता और हैं| दो तीन दिन से माँ सर में दर्द की शिकायत लगातार कर रही हैं| कल ही तो डॉक्टर को दिखाया था| डॉक्टर ने विभोर को यकीन दिलाया हैं कि शायद वक्त-बेवक्त की नींद ने ये सर दर्द बनाया हैं|सर दर्द को कम करने की दवाई के साथ विभोर की पूरी तसल्ली के लिए एक-दो टेस्ट भी लिख दिये हैं| उन्हीं टेस्ट को ले हल्का सा खटका बना हैं| करे क्या!!! नंवबर का महीना चल रहा हैं और छुट्टियाँ सारी खत्म है| नहीं तो अनुभा के आने तक छुट्टी ले बैठा रहता| ये चोर तस्सली वो अपने मन को जरूर देता|
शाम को विभोर आकर दरवाजा खोलता हैं| ऊपर से नीचे तालो के चक्रव्यूह को खोलने में उसे खासा वक्त लग जाता हैं| घर में अंधेरा फैला हैं जो विभोर के मन को भी अपने में लपेटने लगता हैं| लाइट का स्वीच तो माँ के बिस्तर के पास ही था| फिर.......।।। सोच वो माँ के कमरे की ओर लपकता हैं|
माँ का आधा शरीर बिस्तर में और आधा बिस्तर के नीचे लटक रहा था| आधा चेहरा पसीने में डुबा विकृत हो रहा था| शरीर धीरे-धीरे बर्फ हो रहा था| शायद कुछ क्षण पहले ही....
डॉक्टर ने बताया कि ब्रेन हेमरेज हैं| आप दस मिनट पहले ले आते तो जान बचाई जा सकती थी| हास्पिटल तो पीछे ही था| मगर वो दस मिनट तो उसने माँ का सुरक्षा कवच हटाने में ही........|
अंजू निगम
देहरादून
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