बदलती बयार

बदलती बयार

"पाँय लागु दद्दा"!! बिसना आ दद्दा की चारपाई की मुंडेर पर टिक गया|
"सौ साल जियो "!! दद्दा का स्वर थोड़ा खीज से भरा था|
"का दद्दा, आर्शीवाद भी पकड़ाते हो और खीजियाये भी पड़े हो|"बिसना दाँत निपोड़ता बोला|
"तो और का करी| लाख समझाये कि बच्चवा ईलेक्शन नजदीक है| तनिक गाँव वालो को दुलार दो| न हो तो गाँव तक एक पक्की सड़क निकलवा लो, पर तोहार ऊपर तो  कुर्सी का नशा चढ़ा था| अब बटोरो बोट!! "फिर आवाज को जरा मद्धम में ला बोले,"मेरी मान तो जिस बार अपनी घरवाली को उतार मैदान में| सुना, आगनवाड़ी से खुबे नाम कमाये हैं| सबको देवी लागे हैं|"
दद्दा की बात वजनदार थी पर बिसना उखड़ गया,"का दद्दा अब जे दिन दिखाओगे| मेरी इज्जत तो पाताल लिये जाते हो|"
"आज बड़ा इज्जत का दुहाई दे रहा है|वो दिन भुल गया जब जेल में ठुँसे रहो और जेही औरत तुम्हें छुड़ाने रात दिन एक किये रही|"
जानता बिसना भी था कि इस मोड़ पर दद्दा का साथ छुटा तो उसका सुरज अस्त समझो| सो तनिक लाड़ से दद्दा के पैरो के पास बैठ गया,"अब तुमई माई-बाप हो|"
लक्ष्मी भी आगंनबाडी का काम संभालती अब सयानी हो गई थी| दद्दा और बिसना का खेल वो समझ रही थी|
  दद्दा ठहरे पुराने चावल| उनका ये पैंतरा सही बैठा और लक्ष्मी ईलेक्शन जीत गई| पर बिसना का दंभ जब-तब पैर पटकता|
"कुर्सी तो जीत गई पर उसे चलाने के दाँव-पेंच का तुझे मालूम हैं| जा,तु अपनी आगनबाड़ी संभाल, मैं ये कुर्सी संभालता हूँ|" बड़ी तड़ी में एक दिन बिसना हुंकार उठा|
  " मुझे जरा भी बेचारी न समझ| आगनबाड़ी संभाल सकती हूँ तो पंचायत का कुर्सी भी संभाल लूँगी| कुर्सी मिली तो रहे, का विकास किये? हम भी तो सुने| हमाय साथ रहना है तो अबसे हमाय हिसाब से रहना सीख| नहीं तो दद्दा के यहाँ अपना ठिकाना ढुँढ|"
लक्ष्मी के तेवर देख आज बिसना को लगा कि इस बदलती बयार में उसका सूरज अब अस्त ही हुआ|

अंजू निगम
देहरादून

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