कितना बाकी हूँ तुझ में मैं
कितना सोचती हूँ बाकी रहूँ तुझ में मैं,
रहूँ तब तक जब तक सांसे हो जिस्म में,
सुबह की चाय जब लरजती हैं होठो पर,
उसकी हर बुँद में बाकी हो तुम,
रेशमी पर्दा से छन कर आती धुप की
हर छुअन में बाकी हो तुम|
हर अलसाई सी अंगड़ाई में
या अब भी सो रहे ख्वाबो में,
यादो की उठ गई सी चिलमन में
अब भी बाकी हो तुम|
मेज पर उल्टी पड़ी किताबो में,
अल्मारी के आधे हिस्से में,
सोफे के बेतरतीब सी सिलवटो में,
जूतो से कुछ कुछ झांकते मोजो में
अब भी बहुत बाकी हो तुम|
ऐश ट्रे की बुझी राख में,
अधखाये रोटी के टुकड़ो में,
पीछे सरक गयी कुर्सी पर,
अधखुली दराजो में
नीली सी लटकी छतरी पर
अब भी बहुत बाकी हो तुम|
तुम उतना बाकी रह गये हर कही,
तुम्हारे बिना जितना बाकी हूँ मैं|
अंजू निगम
देहरादून
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