टीस
"भाभी, इतने सयाने बच्चे हो गये| पर रोटी अभी भी गोल बनाना नहीं आया आपको|" ननद ने आते ही हँस के ये जहरीला तीर मुझ पर छोड़ दिया|
ड्राइनिंग टेबल पर सब बैठे थे| पति की ओर देखना बेकार था| वे कभी मेरी पैरवी पर नहीं उतरे| शादी के बाद कभी एक आध बार दबे सुर में मेरी तरफ की बात रखी थी मगर दोनो ननदो और सास की तिकड़ी ने अपने बेतुके तर्कों के प्रचंड आवेग से उन्हें वही धराशायी कर दिया था|
दोनो ननद भले ही शादी कर अपनी गृहस्थी में रम गयी हो पर हमारी गृहस्थी में उनका हस्तक्षेप जस का तस बना रहा|
मेरे बच्चे भी इतने बड़े हो गये थे कि अपनी माँ का अनादर और पापा की उदासीनता उन्हे टीस बन चुभती थी| मेरे दिये संस्कारो का असर ही था कि वे अपनी जुबान सिले रहते |
आज दोनो ननदो का एक साथ आना हुआ| पता चला कि दोनो अपने भतीजे के लिए रिश्तो का अंबार लेकर आयी हैं| सबके साथ मैं भी बैठ गयी| किस माँ को अपने लाड़ले के लिए भावी पुत्रवधु चुनने की ललक नहीं होगी!! पर मैं वहाँ मात्र बिन न्योते श्रोता सी बैठी रही| दोनो ननदो और पति का राय-मशवरा चलता रहा और मुझे किसी उपेक्षित फर्नीचर की तरह कोने में खिसका दिया गया|
"अरे!! भाभी हम इतनी देर से आये आपने पानी भी न पुछा!! पहले पानी पिलाईये फिर गरमा-गरम चाय के साथ पकौड़े भी बना ही लीजिये| भई, काम तो आप ही का करने आये हैं|" ननद बेतकल्लुफ बोल उठी|
" अरे!! आकाश, तुम भी तो अपनी पंसद बताओ| आखिर तो तुम्हें ही उसके साथ अपनी सारी जिदंगी निकालनी है| फिर न कहना कि बुआ न कैसी अनगढ़ लड़की के साथ बांध दिया जिसे गृहस्थी की समझ ही नहीं| "कह छोटी मेरी ओर देख मुँह दबा हँस दी|
अपमान से जला मेरा चेहरा बिगड़ रहा था| पति तो सदैव की तरह आँखे अंधो की तरह और कान बहरो की तरह बनाये मासूम से बैठे रहे| पर आकाश ने रसोई की ओर बढ़ते मेरे कदम रोक दिये," माँ आप यही बैठो| चाय के साथ पकौड़े आज मैं बनाता हूँ | लड़की पंसद करने का अधिकार मैं आपको देता हूँ| बस माँ, लड़की आप जैसी संस्कारी हो पर ऐसी भी जो कम से कम अपनी बात रखना जानती हो| और ऐसी भी कि कोई बेवजह उसका तिरस्कार न कर पाये|" कहता आकाश बुआ और पापा की ओर देखता रसोई की ओर बढ़ गया|
अंजू निगम
देहरादून
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