ईमान की रोटी

ईमान की रोटी

चार -पाँच आलू, दो प्याज, छोटी शीशी में कड़वा तेल और कागज की थैली में एक बखत की रोटी बनाने भर का आटा| दो-दो ईटे तीन तरफ टिका अपना चुल्हा तैयार कर लिया था इकबाल ने|
    तीन दिन पहले ही तो कागज की थैली शायद हल्की पड़ गयी थी| सारा आटा जमीन पर बिखर आया था| उस दिन इकबाल का फांका तय था पर मैत्री ने आ उबार लिया था|
"क्यों इकबाल ,अभी निम्मो ने बताया कि इकबाल भैया जमीन में गिरा आटा ऊपर-ऊपर से समेट रहे हैं| अब क्या बहू जी के द्वारे से तुझे दो रोटी का सहारा न मिलेगा? ऐसा भरम कब से पाल लिया तूने!!"
"वो बहूजी, मैंने सोचा इतने बखत तक अम्मा ने अग्रासन भी न निकाला होगा| फिर अम्मा जब तक रसोई झुठी न कर ले, मैं कैसे.....?" कह इकबाल संकोच में गढ़ गया|
"तेरी बात भी सही| पर आज निम्मो न बताती तो तेरा फांका था| तु रुक, अम्मा को खिला तेरे लिए खाना परोस लाती हूँ| फिर तु भुल गया कि तेरी अम्मी को कहे थे कि तेरे अच्छे -बुरे में मैं हमेशा खड़ी रहूँगी| आगे कोई बात हो तो मेरे कान तक पहुँचा दिया कर|"
   इधर इकबाल को कासिम मियाँ के यहाँ काम मिल गया था| इकबाल का काम देख कासिम चाहते थे कि अब से इकबाल उनके साये में पले| सीधा-सरल इंसान| हलक कर काम लो और दिहाड़ी की भी कोई मगजमारी नहीं| इस सबब से कासिम ने खासे पैंतरे डाले पर सब औंधे मुँह गिरे| बाजार में कासिम का खासा दबदबा था सो, इस तरफ का खौफ भी इकबाल पर हावी किया गया ," बरखुरदार, गर मेरा दर नहीं तो हर जग। से तेरा हुक्का-पानी बंद|"
   इस ऐवज जब तड़के कासिम मियाँ का बुलावा आया तो इकबाल समझ गया कि अभी कुछ कसर रह गयी हैं जो पूरी करनी हैं|
" अगले महीने सोच रहा हूँ कि ऊपर की दुछत्ती हटा दो खुले कमरे निकलवा लूँ| तो अगले महीने से इस सबका पूरा बयाना तुझे दिया|" एक रहस्यमयी मुस्कान ओढ़े कासिम बोले|
"दो महीने बाद ही तो दीवाली लगेगी| हम पहले ही पाँच-छः घर के रंगाई-पुताई का काम ले लिये हैं| हुजूर, आप कोई और मजूर ढुँढ लियो| मुझे तो फुरसत न मिलेगी|" अपनी तरफ की बात खोलते इकबाल बोला|
इकबाल की बात सुन कासिम तैश में आ गया," आजकल उस मुहोल्ले की  दाल तुझे ज्यादा भा रही हैं| बिरादरी से बैर पाल रहा हैं| ऐन बखत हमई काम आयेगे| "
इकबाल शांत भाव बोल उठा," हुजूर, मेरा अल्लाह जानता है कि आज तक मैंने ईमान की रोटी खाई हैं| धर्म की रोटी से हम गरीब का पेट नहीं पलता|"

अंजू निगम
देहरादून

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