जुस्तजू
संगमरमरी दीवारो के पीछे सिसकती हूँ मैं,
दगाबाजी के घने बियाबान भटकती हूँ मैं|
जुस्तजू उनकी थी , जो मिल न सके कभी,
वफा के दिये जलाये हर पल तड़पती हूँ मैं|
हर शाम खाली राह ताक लौट रही आँखे,
उम्मीद की हर रात दीवाली मनाती हूँ मैं|
अदावत जिस कदर बसी रही उनकी तरफ,
किस्मत की ये हारी बाजी भी उलटती हूँ मैं|
आंसमा का हर सितारा बुझ रहा था क्यों,
जफा की हर आंधी में उन्हें रोशनी देती हूँ मैं|
हर सितम उनका दर्द बेहिसाब देता हैं मुझे,
अश्को के मलहम से खुद को सहलाती हूँ मैं|
अंजू निगम
देहरादून
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