हवा का रूख

हवा का रुख

हवा के मद का गुमान होता बिसना को तो बातो को यूँ न घुमाता| दद्दा ठहरे पुराने चावल, वे परख गये थे, उल्टी
   बहती बयार का रुख| जमाना बदल रहा था, पर बिसना था कि वही बीस-पच्चीस बरस पहले का दबदबा ओढ़े था| माहौल में इतने खम पैदा हो गये थे कि सब कुछ सुलटा कर अपनी ओर की सीधी राह निकालना मुश्किल हो रहा था| जितना जोड़ता उतने टुटने को तैयार बैठे थे|बिसना के उल्टे दिन शुरु हो गये थे| पर उसकी पेशानी और जुबान की ऐठंन काबु में ही न रहती|
    दद्दा थे राजनीति के पुराने खिलाड़ी| दाँव-पेंच के सारे खम उनकी नजरो के तौल से गुजर चुके थे| पर मन की शिकन न कभी चेहरे पर उतारते, न जुबान पर| उनके इस संयम का लोहा तो बिसना भी मानता था| तभी दद्दा के चरणो में अपना ठौर बनाये था| दद्दा ने भी जो बिसना का हाथ पकड़ा तो विपरीत दिशा में भी हमेशा उसके साथ ही खड़े मिले| पर अब दद्दा का शरीर ढलकने लगा था, वे चाहते थे कि उनका ये चेला  जिम्मेदारियों  की पोटली उनके कंधे से सरका अपने कंधो पर टिका ले| लेकिन इस बार बिसना के राहू तेज थे,सो दद्दा का
विचार बना कि इस बार बिसना की जगह उसकी घरवाली को पंचायती चुनाव में उतारा जाये| लक्ष्मी की गाँव की औरतो में गहरी पैठ बन गयी थी | ऊपर से आँगनबाड़ी का काम संभालते सब ओर से सयानी हो गयी थी| कोई उसे यूँ ही जमीन पर नहीं उतार सकता था अब|
" दी,ई महीने का सारा हिसाब-किताब तैयार कर दिये हैं, जरा एक नजर मार लो|" जया चुन्नी का पल्लु ठीक करते बोली|
"  इत्ती जल्दी का रही| अभी हफ्ते पहले ही तो दिये थे| हम तो सोची रहे कि आधा महीना उतर जायेगा पुरा हिसाब बनाने में| मगर तु तो बहुत सयानी है !!!इतनी जल्दी सारा सुलटा लिया| गणित की पुरी पक्की हैं री|
  पिछले बार संतोष को दिये थे, इतना गड़बड़ी डाली रही, सारा जाँच दुबारा करनी पड़ी| " लक्ष्मी रजिस्टर पलटते बोली|
"मेरा काम भी जाँच लो दीदी,कही कोई झोल न निकल आये|" निर्मल सी एक मुस्कान लक्ष्मी पर डालती जया बोल उठी|
  जया का सधा काम देख लक्ष्मी  निहाल हो गई| पिछले कई बार से हिसाब की गड़बड़ी उसके लिए सरदर्द बन गयी थी| आगे भी तो उसी को जवाब देना पड़ता है| बस, ईमान की भी पक्की निकले तो वो तर जायेगी|
  और पिछले एक माह से लक्ष्मी जया को परख रही थी| एक नया पैसा इधर-उधर नहीं| भगवान की भेजी कोई दूत ही लगी  जया लक्ष्मी को| कितनी बार हुआ कि नोटो की गड्डी सामने रखी रही पर जया के लिए सब मिट्टी| ऐसा जोगन सा संयम कहाँ से ले आयी, कभी लक्ष्मी के मन में ये विचार जरूर सिर उठाता| लेकिन वो खरा सोना थी|
   इन रूपये पैसो के झमेलो में वो बिसना का साथ बिल्कुल नहीं चाहती थी| जानती थी उसका मरद जितना जमीन के ऊपर दिखता है उससे ज्यादा जमीन के नीचे है| उसके लोभ को वो कई बार परख चुकी थी|
   राजनीति के दाँव-पेंच में डुबा था, नहीं तो अभी तक आँगनबाड़ी के काम में दस अड़गे डाल चुका होता|
   इधर दद्दा को जब अपनी जमीन भी हिलती दिखाई दी तो वो बिसना को घेर कर बैठ गया| उनके लिए बिसना पर अपनी कहे की पलत चढ़ाना कौन मुश्किल काम था| बातो के दो कोड़े बरसाता और बिसना उनके चरणो में| निरा गंवई!! अक्षर ज्ञान भी कामचलाऊ| वो तो दद्दा की शार्गिदी में रुआबदार लोगो के बीच उठना बैठना हो गया| वरना राजनीति शंतरज में वो पैदल था पुरा| जो थोड़ी ताबदारी थी,वो दद्दा के करम से थी|
   उस दिन दद्दा सोच ही बैठे थे कि आज बिसना को उसकी जगह बता दे| बातो को थोड़ा लपटते हुये बोले,"देख बिसना, इस बार तेरा तरफ का तौल बहुत हल्का पड़ गया है| मैं कई से परख रहा हूँ जे बात|
गाँव वालो का तेरी ओर का रुख सुख गया हैं|एकदम बंजर सा| मेरी मान तो इस बार के चुनाव में लक्ष्मी को मैदान में उतारते हैं| एक बार चुनाव जीत गई तो कौन आ कर हिसाब माँगता हैं कि कुर्सी कौन चला रहा है|" दद्दा की बात ठोस जमीन पर टिकी थी बावजूद इसके बिसना एकदम उखड़ गया," का दद्दा अब जे दिन दिखाओगे?बिसना का मान को तो तुम पाताल में ले जाने को तैयार बैठे हो|" बिसना का मुँह तैश में धधकने लगा|
" का बच्चा का जैसा रिरिया रहा है| लोभ तो तुम्हारा ही था जो कि अपनी कुर्सी को ही दीमक की तरह चाट लिये| जान लो इस बार भी नाही चेते तो कुर्सी के साथ तुम्हारा बिर्सजन भी पक्का|" दद्दा के आवाज के कड़कपन ने बिसना के गुस्से पर पानी के छींटे मार दिये| वो वही जमीन पर धपक कर बैठ गया| जानता था कि दद्दा भी रुठ गये तो उसका सूरज अस्त समझो|
दद्दा अभी भी उसी रौ में बहे जा रहे थे| आज पूरे मन से वे बिसना के तेवर नीचे करने को तैयार बैठे थे|
"आज बड़ा उबाल खा रहा हैं| वो दिन बिसार दिये जब जेल में ठुँस दिये रहो| और ऐही लड़की तुमाए लिए रात दिन एक किये रही| कोर्ट-कचहरी सबही तो करवा दिये रहो|" बिसन के मुँह का सारा रंग उतर उसकी जुबान पर आ गया| रिरियाता बोला," दद्दा उस बखत को कईसे भूल सकत है!! आप माई-बाप हो| जईसा ठीक लगे सोई करो|"
बिसना का उतरा मुँह देख दद्दा थोड़े नरम पड़े| स्वर में स्नेह की परत चढ़ा कर बोले,"बिसना जरा दिमाग की गर्मी हटा कर सोच| तेरी जोरु जबसे आँगनवाड़ी से जूड़ी है| उसकी गहरी पैठ बन गयी है गाँव की औरतन के बीच| उसकी वजह से कितने घरो का चुल्हा जल रहा है| सरकारी खर्च पर गाँव वालो के बच्चों को एक बखत का खाना मिल जाता है| पढ़ाई अलग से चल रही है| उनकी जिदंगी सुधर रही है और का चाहिए इन लोगन का| पहले ही चेते होते तो ई नौबत ही न आने पाती| इस बार अपने को जरा दबा कर बैठ| सोच जरा| लक्ष्मी को संरपची मिल जाये| तो पहले आधा बाद में पूरा जिम्मा तेरे हिस्से|" दद्दा के चेहरे पर काईयापन की झलक देख बिसना पूरी तरह आशवस्त हो बैठ गया|
दद्दा की वाणी सही साबित हुई| लक्ष्मी को संरपची मिल गयी| बिसना का घाघपना फिर उभरा,"चलो अब घरवाली के दम पूरा ऐश करेगा|" लक्ष्मी मगर भांप गयी थी कि दद्दा और बिसना की सोच किस ओर मुड़ी है|
    संरपची मिले लक्ष्मी का पूरा एक महीना हो चुका था| रहने को खुला ,हवादार घर मिल गया| कुल मिला ऊपर से सब ठीक चल रहा था| पर बिसना का दंभ रह रहकर सिर उठाने लगता|
  उस दिन स्वर में भरसक चाशनी घोल बिसना बोल ही उठा," लक्ष्मी, काहे तुने इतने काम के नीचे  अपने को दाब रखा है| हिसाब किताब कौनो आसान काम रहे| तु काहे फिकर में घुलती है|कल से सारे हिसाब की जिम्मेवारी मेरी|"
"अरे न!! पैसे-रुपये का हिसाब बहुत जिम्मेदारी का रहे|पहले ही सोच लिये थे कि ई सारा ताम-झाम जया संभालेगी| कॉलेज की पढ़ी-लिखी लड़की है| हिसाब की पक्की और ईमानदारी की भी|" एक टेढ़ी नजर बिसना पर डाल लक्ष्मी बोली|
  उसके ऐसे सयानेपन से बिसना का दिमाग गर्म होने लगा| "कान खोल सुन ले| ई घर में तेरी संरपची न चलने की| जो बात हम कहे दे वही तुझे करना पड़ेगा| बहुत देख रहा हूँ कि अपने मरद को उन्नीस करने की जुगत में हैं |बहुत दिमाग न फिरे| संरपची का मिल गयी, उड़ने लगी| याद रख,तेरे पंख कुतरना मुझे खुब आता है| घर का चुल्हा-चौका संभाल| ये संरपची तेरे बस की न|" दाँत किटकिटता बिसना बोल रहा था|
एक तीखी नजर बिसना पर डाल आज लक्ष्मी फैसले पर उतर आयी," घर के मरद हो तो वही बनकर रहो| और ये घर का क्या बाँच रहे हो| ई घर गाँव के संरपच को मिला है| तुम्हें कोई और संरपची करनी है तो जाओ दद्दा के घर को अपना ठौर बनाओ| ईहा तुम्हारे दाँव-पेंच न चलने के| चुल्हा में आग जली रहे, वो भी और उसे संभालना भी जानती हूँ| तु का जानता है?घर चलाने तक का तो पैसा पा नहीं पाता और चला है हमाय को अपने अँगूठे के नीचे रखने| ई घर में रहना है तो हमाय हिसाब से |इज्जत चाहता है तो देना भी सीख|" इतना कह लक्ष्मी, आत्मविश्वास से भरी, संरपच के दफ्तर चल दी|
    आज बिसना और काफी हद तक दद्दा का सूरज भी अस्त हो चला था|

अंजू निगम
देहरादून

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