इस लघुकथा को मैंने हमारी एडमिन साथी चित्रा राणा राघव जी को भेजा था, लेकिन जाने कैसे यह मेल के आउटबॉक्स में जाकर अटक गई थी।
इस लघुकथा को अगर हम नहीं पढ़ते तो यह हमारा अपना नुकसान हुआ होता। सचेत करने के लिए एवं एक अच्छी लघुकथा की आमद करवाने हेतु आदरणीया अंजू जी का हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।
बैसाखी : अंजू निगम
खासी पुरानी इमारत थी जिसके तीसरे माले में वह रहती थी| ऊपर तक चढ़ते मुझे हफनी आ गई|
"रेनू के हाथ में जादू है| एक बार उसके सिले कपड़े पहन लोगी तो दूसरे किसी दर्जी की तरफ मुड़ोगी भी नहीं|" शिखा ने बड़े विश्वास के साथ जब कहा तो मैंने भी सोचा, जरा उसके कहे को परख लूँ| पर जगह देख सारा जोश ठंडा पड़ने लगा|
"शिखा ने भी कहाँ फंसा दिया, चढ़ते चढ़ते दम फुलने लगा|" गुस्से में शिखा को सौ लानते भेजी|
दरवाजा उसकी माँ ने खोला| चेहरा शिष्ट, सौम्य|
मैंने आने की वजह बताई| "आईये बैठिए , शिखा ने बता दिया था| रेनू बस आती होगी| आज देर हो गई|" कह पानी लेने अंदर चली गई|
घर एकदम साफ, स्वच्छ| सारा सामान करीने से समेटा गया| मैं कमरे का मुआईना करती रही|
ट्रे में पानी का गिलास रखे जब वे लौटी तो बात करने के इरादे से मैंने कहा, "आपकी बेटी के हाथों का जादू हमें यहाँ खींच लाया| वैसे आपके यहाँ सूट की सिलाई कितनी हैं?" पता होते भी मैंने पूछ लिया|
"सिपंल सूट के ढाई सौ और डिजायनर के पाँच सौ से छः सौ रुपए के बीच|"
एक प्रोफेशनल की तरह उन्होंने सिलाई बतायी|
"हमारी बुटीक वाली कुमकुम तो हमारे पैसों का मोह ही नहीं करती| जो मुँह से कह दे वही देना पड़ता है| जी.एस.टी का तमगा दिखा पक्की रसीद भी नहीं देती| फिटिंग इतनी बढ़िया देती है कि छोड़ा नहीं जा रहा |" मेरे मन ने खाका खींचा|
तभी रेनू की मम्मी सिलाई की बानगी दिखाने के लिए तीन चार सूट उठा लायी|
मेरी आँखों की चमक बढ़ गयी| बारीक और साफ काम| डिजाइनर सूट तो लाजवाब लग रहे थे| इनके तो कुमकुम पंद्रह सौ से कम न लेती और दस अहसान से हमें अलग लपेटती।-मैंने मन ही मन हिसाब लगाया|
तभी सीढ़ियों से किसी के ऊपर आने की आवाज आई|
"लगता है रेनू आ गई|" बोल रेनू की मम्मी सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी| रेनू ही थी| दोनों हाथों में बैसाखी लिए|
जिन सीढ़ियों को चढ़ते समय मुझे हफनी आ गई थी उसे रेनू कम से कम एक बार तो जरूर चढ़ती-उतरती होगी| मेरा मन खुद पर शर्मिंदा हो उठा|
उसने शायद मेरे मन के भाव पढ़ लिए थे|
"आपका नाम सुन कर यहाँ आई थी| आप जितने पैसे लेगी ,मैं देने को तैयार हूँ|" मुझे लगा नहीं कि ये दया का सागर लहरा मैं उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा रही हूँ|
बहुत हल्के पर दृढ़ लहजे में, मेरी आँखो में झांकते वो बोली,"आप परेशान मत हो|आपसे भी मैं उतने ही पैसे लूँगी जितने सबसे लेती हूँ|" मुझे लगा बैसाखी की जरूरत उसके पैरो से ज्यादा मेरी सोच को हैं|
अंजू निगम
देहरादून
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