मुक्तक

बारिश का खम जो लगा हैं दाँव में,
मन का कोई काँटा फिर चुभा पाँव में|

तुमको मुझसे रहती जो ये अदावते,
वो हर रात उतरती पलको की छाँव में|

अंजू निगम
देहरादून

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