गिर का जंगल
वना का परिवार बड़ा है| माँ-बाप और छः भाई-बहन | बाहर के खतरो से अपने और परिवार की रक्षा करने में वना के पिता अब असमर्थ से हो चले थे, इसलिये तो उन्होंने गिर के जंगल में आ जाने के लिये अपने को परिवार सहित वन रक्षको को सौंप दिया था|
कम से कम अच्छा खाना तो मिल ही जायेगा| वना के पिता का जंगल में बहुत रौब हुआ करता था| सारे जानवर वना को हाथो हाथ लेते थे| पिता की गिरती सेहत न होती तो वो कभी यहाँ न आता| पुराने दिन वना को बहुत याद आते| कभी माँ का दुलार पाते ही वो अपने मन की बात माँ से कह लेता| माँ ठंडी आह भरती|" तेरे पिता के हाथ-पैर चलते रहते तो क्यों इस उर्म में हम यहाँ आते!!पर यहाँ भी क्या बुरा हैं| बैठे-बैठे खा रहे है और कपटी सियारो से भी रक्षा हो रही है|"
"माँ, यही हाल रहा तो मैं शिकार करना ही भूल जाऊँगा| मैं जंगल का राजा बनना चाहता हूँ|" वना अपने सपनो की बात करता है|
" चुपचाप यही बैठा रहे| तेरे डेढ़ बित्ते से शरीर को तो सियार यूँ चबा जायेगे|" माँ वना को डर दिखाती है|
"ठीक है, मैं अपने बड़े होने का इंतजार करूँगा| और जंगल का राजा बन कर दिखाऊँगा| तब मेरे शरीर में इतनी ताकत होगी कि ये सियार भी दूर भागेगे|" वना अपना फैसला सुनाता है|
"मैं वो दिन हमेशा से देखना चाहती थी|अगर तुम ये कर लोगे तो सबसे ज्यादा मुझे खुशी होगी|"माँ वना को लाड़ दिखाती बोलती है|
वना माँ की गोद में बैठ जाता हैं और कुछ ही देर में नींद के आगोश में खो जाता है|
अंजू निगम
देहरादून
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