तुझे सलाम

तुझे सलाम

"सुधीर मैं ये साड़ी पहन लूँ | तुम्हें तो ये साड़ी हमेशा से पसंद  थी न|" चौड़ी लाल पाट की महेश्वरी साड़ी सुधीर को दिखाते माधवी बोल उठी|
     आज माधवी के लिये बहुत बड़ा दिन है| रात दिन की अथक मेहनत आज सफल होने वाली हैं| उसकी पहली पुस्तक का आज विमोचन है| सुधीर ने हमेशा चाहा कि माधवी घर की चारदीवारी में न सिमट कर रह जाये बल्कि अपनी एक पहचान बनाये|
        आज माधवी पूरे मन से तैयार हुई है| सुधीर को बहुत पंसद है कि माधवी हमेशा यूँ ही तैयार होकर रहे|
कई दिनो बाद यूँ तैयार होकर जाना उसे असहज बना रहे थे| आदत भी तो छुट चली थी| उसने सहमति के लिए सुधीर की ओर देखा ,वो माधवी को देख मुस्कुरा रहा था|
  "तुमने ही तो चाहा था न कि मैं अपने देश को शब्दों में ढालू| उसके हर पहलु को लिखुँ | साथ ही सेना का देश के प्रति जज्बा लिखुँ| ताकि आम आदमी भी देश प्रेम के अहसास से सराबोर हो| मैं इस किताब के जरिये तुम्हारा देश प्रेम लोगो के सामने लाना चाहती हूँ| चाहती हूँ तुम्हारा बलिदान देश के युवाओँ के अदंर वही वतनपरस्ती की लौ जगाए जो तुम्हारे अंदर हमेशा धधकती थी|" कहते माधवी ने सुधीर की तस्वीर पर फूल  समर्पित कर दिये|
        सेना की वर्दी में सुधीर की तस्वीर अब भी मुस्कुरा रही थी|

अंजू निगम
देहरादून

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