निगाह, अदा ,वफा
जो निगाह निगाहो से मिली, पुरनम हिल उठे,
अहद की बानगी पर तब्बसुम खिल उठे |
अगरचे तु अमानत ही किसी और की रही,
अदावत भी कर न सके, लब सिल उठे|
वफा के तर्जूबे जो हासिल किये अब तलक,
कैफियत भी दे न पाये, जख्म छिल उठे|
शफ्फाफ सी तेरी हर अदा लगी थी मुझे,
फकत रकीब ही बने तुम, दर्द मिल उठे|
मुमकिन था गीत कोई बनता मेरी ऐवज,
हर्फ ही मगर बिखरते गये, टुट दिल उठे|
अंजू निगम
देहरादून
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