दोस्ती

दोस्ती

वो क्लास की पिछली सीट पर गुमसुम बैठी थी| वो अक्सर यूँ ही अकेले बैठी रहती थी| खाने की छुट्टी के दौरान भी वो क्लास में ही दिखती| और बेमन सूखी रोटी के टुकड़े मुँह में ठुँसती| वेणी नाम था उसका|
   अनन्या उस स्कूल में नयी आई थी| उसका भी अभी कोई दोस्त नहीं बना था| सो इस मजबूरी के चलते उसको भी क्लास में ही बैठ कर टिफिन खाना पड़ता| कई दिन से अनन्या वेणु को देख रही थी| हर वक्त उसकी आँखो में उदासी लिपटी रहती|
   उस दिन अनन्या ही पहल कर उसकी तरफ अपना टिफिन बढ़ा दिया|
"क्या आज मैं तुम्हारे साथ अपना टिफिन शेयर कर सकती हूँ| "
अनन्या के कहने पर उसने  नजर उठा अनन्या की ओर देखा| " आपको कम पड़ जायेगा|" पर उसकी आँखे जुबान का साथ नहीं दे रही थी|
"नहीं पड़ेगा| तुम थोड़ा तो लो|" अनन्या ने फिर इसरार किया|
  उसने बहुत तृप्त हो खाया,मानो महीनो से उसने ऐसा खाना न खाया हो|
  "दोस्त" !!कह अनन्या ने उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया|
  "दोस्त" कह वेणी ने उसका हाथ थाम लिया| उसकी आँखो में चमक बढ़ने लगी थी|
  उससे कुछ बाते करने के बाद अनन्या बोली,"क्या मैं तुम्हारे घर आ सकती हूँ ?आंटी से भी मिल लूँगी|"
उसकी आँखो के जलते दीये फिर बुझ गये,"मेरी माँ नहीं  है|"
एक क्षण अनन्या सकते की हालत में खड़ी रही| फिर उसके कंधे पर हाथ रख बोली,"मेरी माँ भी तो तुम्हारी माँ हुई न| इसलिए आज के बाद हम दोनो माँ के हाथ का बना खाना ही खायेगे| खाओगी न!!!मना तो नहीं करोगी?" अनन्या की आँखो के आगे वेणी के टिफिन की सूखी रोटियां घुम रही थी|
"हाँ, मगर आँटी को बेवजह ही परेशानी होगी|" इस बार वेणी का मन उसकी आवाज का साथ नहीं दे रहा था|
"नहीं माँ को बहुत खूशी होगी|" कह अनन्या की आँखे खुशी से चमक उठी|
इसके बाद अनन्या ने अपना टिफिन और वेणी के दुख दोनो सांझा कर लिए| वो कहते है न कि दुख बाँटने से आधे हो जाता है|

अंजू निगम
देहरादून

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