गजल
बैठे हैं तेरे कुचे पर हम राह तकते रहे,
तेरी हर एक तस्स्वुर की चाह करते रहे|
मेरी हर वफा को इल्जाम ही हैं कहा,
रकीब से बने वो हम आह भरते रहे|
खत तो जाते रहे खारिज वो करते गये,
अफसानो का दौर था हम वाह सुनाते रहे|
गली थी एक उनकी,कदम थे एक मेरे,
मेरी हर एक सांस की थाह वो पाते रहे|
एक दौर जब मेरा था, अब दौर उनका हैं,
हमे मंजिल की चाह थी,वो राह मिटाते रहे|
अंजू निगम
देहरादून
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें