तारो की करे बात
तन्हा से तारे सजते कब है,
छितरे बादल बरसते कब हैं|
सिलवटो से भरी ये हैं उम्र,
खम इसके सुलटते कब है|
सर्द से रिश्ते जम गये हैं सारे,
वक्त की गर्मी से पिघलते कब हैं|
पतझड़ में ही अब आना तुम,
बंसत में फूल खिलते कब है|
जिंदा रहे उम्र भर तो क्या,
मौत से जंग हारते कब है|
सीचंते तो रहे शजर रिश्तों के,
परवाह की शाख तोड़ते कब हैं
साथ चल निकले कारंवा के,
छुट चले साथी जुड़ते कब है|
अंजू निगम
देहरादून
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