तारो की बात

तारो की करे बात

तन्हा से तारे सजते कब है,
छितरे बादल बरसते कब हैं|

सिलवटो से भरी ये हैं उम्र,
खम इसके सुलटते कब है|

सर्द से रिश्ते जम गये हैं सारे,
वक्त की गर्मी से पिघलते कब हैं|

पतझड़ में ही अब आना तुम,
बंसत में फूल खिलते कब है|

जिंदा रहे उम्र भर तो क्या,
मौत से जंग हारते कब  है|

सीचंते तो रहे शजर रिश्तों के,
परवाह की शाख तोड़ते कब हैं

साथ चल निकले कारंवा के,
छुट चले साथी जुड़ते कब है|

अंजू निगम
देहरादून

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top