दिन: शनिवार
विधा: कविता
विषय: मुहावरे
आज माँगा जब अपना किराया बकाये,
हो गये नौ दो ग्यारह अपने सहाय|
पकड़ी भागते चोर की फिर लंगोटी,
लताड़ा जमकर कि तु हैं बड़ा खोटी,
रोना अपना लेकर बैठ गया वो,
छप्पन टके खर्चे बता गया वो|
वो मुझे सब्ज बाग दिखा रहा था,
मैं साँप को दूध पिला रहा था|
लहू लगा शहीदों में भरती हो रहा था,
अपनी कागज की नाव चला रहा था|
पानी पेट का मेरे हिला दिया था,
मुँह देखी मुहोब्बत कर रहा था|
दूर ही रहो ऐसे दोगलो से,
शहद गिराते जो जुबान से|
अंजू निगम
इंदौर
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