मिथलेश दीक्षित जी

इंदौर में हुये "महिला समागम" में पहली बार आदरणीया दी से मुलाकात हुई| दो दिन चले इस समागम वे हमसे इतनी सहजता से मिली मानो बरसो का साथ हो| ऐसी सहजता,सरलता वो भी साहित्यजगत के नामचीन आधार स्तंभ द्वारा, मुझे अभिभूत कर गये|

     पर हम यहाँ दी के कृतित्व की बात करने उपस्थित हैं| तो उसी की बात| साहित्य की जितनी विधा,तकरीबन हर विधा में की दी हस्ताक्षर बन गयी है| सभी में उनका वृहद कृतत्व है| चाहे वो गीत,कविता, क्षणिका हो या आलेख, ललित निबंध या हाइकु विधा|


     उनके संपूर्ण लेखन को शब्द सीमा में बांध लेना नामुमकिन सा ही लगता है| इसलिए उनकी विस्तृत लेखनी में से उनकी "हाइकु विधा" पर ही कुछ शब्द सृजन करना चाहूँगी| इसी संदर्भ में उनके द्वारा रचित उनके हाइकु संग्रह"लहरो पर धूप" को जरूर उद्धत करना चाहूँगी|


  उन्होंने हाइकु विधा की जो नद धारा बहायी है उसमें भारतीय संस्कारो एंव तत्वो की सौम्य,निर्मल बहाव दृष्टिगोचर है| मन उसी नद धारा में अविरल प्रवाहित होता जाता है| एक बानगी:-

शाश्वत सोच/उर्जस्वित सत्य में/देती आलोक


                        या


पल क्या बहा/भुलावा सा देकर/लिये जा रहा|

दरअसल ये कहना अतिशयोक्ति क्यों कर होगा कि दीदी और हाइकु एक दूसरे के पर्याय बन गये है| उनकी हाइकु एक पूर्ण कविता रचती प्रतीत होती है| तीन     ५ ७ ५ की क्रमशः पक्तियों में एक पूर्णता| भाषा ऐसी सहज,सरल की ह्दय तल में बस जाये| जैसे:-

सूखे है वृक्ष/सूख रही चेतना/जीवन बिना


                         या


अमर हुआ/जिसने समझा है/ जीवन क्या है|


 


जीवन के हर मायने,हर आयाम उनके हाइकु में झलकते है| चाहे वो पर्यावरण हो,जीवन की गुढ़ता हो या जीवन का सौंदर्य बोध| 


उनके कुछ हाइकु जीवन के सौंदर्य बोध से साक्षात्कार करवाते:-

परमरुप/जग के शरीर में/रुप रहित


निराकार ही/प्रतिबिम्बित होता/जगती पर


होता आभास/चैतन्य की दशा में/दैवी विकास

जीवन की बात करे तो ये दोनो रुपो में आपके सामने होता है| कभी अदम्य सुख की पराकाष्ठा और कभी दुखो के झंझावात| जीवन के इन्हीं मर्म को देखिए कितनी खूबसुरती से उकेरा है|:-

आज तलक/भयभीत नहीं हूँ/झंझावातो से|


विचलित भी/कर सका न कोई/तीखी घातो से|


जीना भी जब/मुश्किल कर दिया/कुछ लोगो ने|


डरी नहीं हूँ/ कठिन समय की/काली रातो में|

प्रकृति को उसके अनेक रुपो में दीदी ने बखूबी समेटा है| हर कोण, हर कण में प्रकृति समाहित है| प्रकृति मर्म


का स्पर्श बहुत सोंधी सी महक लिए है| इससे मिट्टी की खुश्बू भी आती है और उजड़ते वन क्षेत्र की वेदना भी प्रतिबिम्बित है| फूलो की महक है तो सूखते पोखरो के प्रति जागरूक होने का संदेश भी उपलब्ध है| मसलन:-

पाखी अटके/देश निकाला हुआ/नीड़ उजड़े|


दृष्टि नहीं तो/प्रकृति निरीक्षण/व्यर्थ परीक्षण|


रोज सुबह/देती नयी रोशनी/धूप की नमी|


फूल-फूल की/निखार छिटकती/ सुदंर आभा|

इंसानी फितरत, समाज के दोगलेपन और बदलती मानसिक वृतियों पर उनके हाइकु में सटीक,सहज आभास दिलाया गया है| एक बानगी:-

न पहले था/वर्गहीन समाज/ न आजकल|


समाज वही/मुद्दे बदल जाते/ नारेबाजी के|


पुनर्गठन/टुकड़ो-टुकड़ो में/नैतिकता का|


नहीं उठ रहे/चिल्लाते रहे हम/ ठोस कदम|


जनता दोषी/ अपराधी तक को/ वोट जो देती|

दीदी नेप्रकृति,दर्शन, जीवन मूल्यों, युगबोध को तो अपने हाइकु में उकेरा ही है, साथ ही बाल-बोध में पगी सुदंर, सहज हाइकु भी प्रस्तुत किये हैं| जैसे:-

चिड़ियाँ आओ/फुदक-फुदक के/नाच दिखाओ|


सपने में भी/दिख रही मुन्ने को/ माँ की ममता|


अपना बच्चा/माँ को लगे फरिश्ता/गहरा रिश्ता|


बंदर मामा/मेरी शादी में आना/नाच दिखाना|

नारी  के उत्पीड़न ,उसके प्रति समाज का रवैये पर भी दीदी ने कलम उठायी है| और ये संदेश भी प्रेषित होता है कि नारी अब तुम अबला नहीं सबला बनो| जैसे:-

नारी सती है/सता रहा है नर/यही अंतर|


भूख लाचारी/ मौत बेरोजगारी/ जुझती नारी|

उनके हाइकु के तकरीबन हर आयाम को इंगित किया पर एक आस्था के रंगो में पगे हाइकु का जिक्र न हो तो बहुत अधूरापन सा रह जाता है| पूरी ओजस्विता के साथ आस्था  के सौम्य,सुवासित रंग बिखरे है|जैसे:-

संत करते/भक्ति रस का पान/पाकर ज्ञान|


विश्राम होता/गहन चितंन में/चिरंतन में|


जाने कितने/इंसाफ की आस को/ पाले रहते|


खिल गये में/चेतना आलोक में/श्रृद्धा सुमन|


तुलसी गाथा/दिल को छुने वाली/बड़ी निराली|


उस प्रभु ने/ हमको पहुँचाया/सही डगर|


आस्था के पार/आस्था के द्वार तक/ आस्था का द्वार|


हम न हारे/एक भगवान के/सदा सहारे|

प्रेम अनूभूति के रस को कैसे विलग किया जा सकता है!! ये रस बेहद मर्यादित, सरल भाषा में निहित है| कही भी भावनाओं का अतिरेक नहीं है|यही तो दीदी के हाइकु की विशेषता है| 

रमता मन/छुट कैसे पायेगा/ अपनापन|


भीगे है अंग/पत्तो ने डाल दिया/ फूलो में रंग|


वंसत आया/ टाँगने मन द्वार/वंदनवार|

 जीवन के कैनवास में ,हर रंग ,हर आयाम को अपनी तूलिका से उन्होंने शाश्वत आकार दिया हैं| उनकी हाइकु कविता ने अपने सुक्ष्म  रुप में भी शब्दो के धागे बहुत मजबूती से पिरोये हैं| न एक भी धागा कच्चा, न बेनूर| उनके शिल्पकौशल ने हाइकु विधा में न केवल जान डाल दी बल्कि उसे ऊँचाई के नये पायदान पर बैठाया| प्रकृति सौंदर्य, जीवन सौंदर्य सभी को इन लघु कविताओं में यथास्थान प्रदान किया है| उनके हाइकु उस सागर सामान हैं जिसमें शब्द मोतियों का अथाह भंडार है ,बस मन गोते लगाता जाये और मोतियों को चुन ह्दयतल में पिरोता जाये|


    उनके लिए चंद लाईन:-

उस शख्स की शख्सियत के क्या कसीदे पँढु,


जिनके ऐवज हजारो ने परवाज भरी हो|


मौन हो जाती मेरी  कलम और स्याही,


कि अब कौन से पैरहन पहनाऊँ उन्हें लफ्जो के|

अंजू निगम


इंदौर

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top