गजल

गजल

मुगालता ही रहा उनकी मुहोब्बत का ,इतना बहुत था,
किताबो में बन गुलाब महकते रहे,इतना बहुत था|

रुखसारो तलक सावन बहता रहा खुब,
अश्को मे सही नाम उनका,  इतना बहुत था|

एक रात मुझमें बन उतर आयी थी जब,
चाँद बन ही साथ रहा उनका, इतना बहुत था|

जफा की कीमत तो हम ही देते रहे,
रकीबो में न रहा नाम उनका, इतना बहुत था|

बहुत बंद  सा था उनका मंका हर तरफ से ,
खिड़की एक खुली मेरी तरफ की,इतना बहुत था|

अजनबी से बने रहे वो मेरे शहर आकर,
गली में मेरे पैर उनके ठिठकने लगे,इतना बहुत था|

ख्वाहिशे कभी इजहार की हद तक बढ़ न सकी,
नजरे उनकी कुछ पल ठहरती रही,इतना बहुत था|

अंजू निगम
इंदौर

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