निगाहें मिला कर कहाँ जा रहे हैं
किताबों में गुल यूँ छुपा जा रहे हैं

सवेरे-सवेरे मिले थे करम से
हुयी शाम दे कर दुआ जा रहे हैं

फजीहत हुई इश्क में यूँ हमारी
गिला है बहुत हम ख़फ़ा जा रहे हैं

अदावत ख़ुदा से न करता कभी दिल
लिए होंठ पर हम सदा जा रहे हैं

न पूछो मिली ठोकरें इस कदर जो
लिए हम वफ़ा की सजा जा रहे हैं

डिम्पल गौड़
अहमदाबाद

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