मर्ज

हाँ मर्ज है मुझे,
फकत दूनिया उसे बेसबब कहे|
मुझे मर्ज है खिदमतगार बनने का
उन लोगो का जो बैठे है सड़क किनारे,
मजबूर, बेबस निगाहो से तकते|

हाँ मर्ज है मुझे,
उन सबका लाड़ला बनने की,
जो लाचार पड़े है वृद्ध आश्रमो में ,
राह तकते किसी 'अपने' की|

हाँ है मर्ज मुझे,
उन तकती आँखो में आशा देने की,
जिनके सपूत खड़े है सीमा पर,
देश पर कुर्बान जाने के लिए|

हाँ है मर्ज मुझे,
एक अच्छा,सच्चा नागरिक बनने का,
जो उखाड़ फेंके सड़ी-गली,लाचार,
चरमराती  समाज व्यवस्था को,
ताकि साँस ले सके हम खुली हवा में,
नवनिर्मित भारत की|

हाँ मर्ज है मुझे|

अंजू निगम
इंदौर

CONVERSATION

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Back
to top