गागर से महक टपक रही थी कई,
जब उन बूँदो ने जंमी को छुआ था,
उस सोंधेपन में भीगी वो महाजाबीन थी|
घुल रही थी जिसकी पेशानी में जेठ की लकीरे,
और हिना के रंग बिखर रहे थे ,
जिसके दुपट्टे में|
 
उसके आँख के काजल ने,
एक छाँव उतारी थी तपती राहो में,
और एक मखमली फुरसत डाली ली,
कुछ पलो की|
लरजते लबो में करार दर्ज होगा,
हमउम्र सी राह गुजारो से,
शायद मिलना होगा इस राह कल फिर से,
उन्हीं महकती बूँदो के लिए,
उसी सौंधेपन के अहसास से लबरेज|
अंजू निगम
इंदौर

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