जिदंगी एक धूप

जिदंगी एक धूप

गर्मी के ढीठपने और उदासियों से ढीले मन को थोड़ी फुरसत देने के लिए वान्या कही घूम आना चाहती थी| रिश्तेदारो के रंगमंच से भी दूर|
      पहाड़ो की वादियों उसे हमेशा उकसाती| पहले बात पैसो की किल्लत पर आ अटकती| पर अब कमल अच्छा कमा लेते थे| हंलाकि कमल अब भी उन्हीं पुराने दिनो को ओढ़े बैठे रहते|और वान्या को खर्चे के नाम सौ ताकीद पकड़ाते| पर इस बार कमल का मन भी काम के ऊँचे  पहाड़ो से उतर लेने और रोज की चिल्लम चिल्ली से बेसाख्ता ऊब चुका था|
   वान्या इस बार किसी पहाड़ी जगह जाना चाहती थी| जो जुनूनी हद तक उसे पंसद थे|और वो इसके एक-एक पल को अपने में तुरप लेना चाहती थी| ताकि अगले कई सालो तक मन की कोई सीवन फिर से न उधड़ आये|
  इस बार जब कमल ने औसत दर्ज का लॉज बुक कराया तो वान्या बोल ही पड़ी,"अब जब अपनी जेबे  हल्की कर यहाँ तक आये हैं तो मुफलिसी से ठहरने का क्या तुक?कुछ मीठी यादे तो हो,समेट लेने के लिए|"
  मौसम का मिजाज असर कर रहा था या इतने सालो बाहर कही न पाने का मलाल दबा था,कमल ने एक कायदे का होटल देख तो लिया पर वान्या को शॉपिंग न करने की ताकीद भी पकड़ा दी|
"अब कुछ खरीदने को न बोलना| वैसे भी ऐसे "टुरिस्ट प्लेस" में ये लोग लूट मचा रखते है|"
  होटल ठीक था| रोज १८-१९ साल का पहाड़ी लड़का चाय-खाना ले आता| ऊपर के दो काम भी कर देता| पर कमल  उसकी तरफ से उखड़ा ही रहा|
  उस दिन उनके चल लेने का आखिरी दिन था| वान्या चाहती थी उस पहाड़ी लड़के को कम से कम दो सौ रुपये तो पकड़ा ही दे| पर कमल को ये बात नागवार लगी|
"इनका तो काम ही हैं ये| होटल वाले पगार बैठने के देते है क्या? तुम्हें तो पैसे लुटाने है|"?
वान्या कसमसा कर रह गयी| उन्होंने सारा समेटा और वही लड़का उसे नीचे तक पहुँचा गया| कमल के चेहरे पर नाराजगी चिपकी रही| सारा सामान टैक्सी में जम गया था और वान्या टैक्सी में बैठ ही रही थी कि वही लड़का भागता आ कमल के पास रुका और कमल की ओर उसका पर्स बढ़ा दिया|
" साबजी! आपका रुम साफ किया तो तकिए के नीचे ये पर्स मिला|" कह वो हाथ जोड़ वहाँ से चला गया|
  पर्स में रखे दो हजार के पाँच नोट उसका मुँह चिढ़ा रहे थे|

अंजू निगम
इंदौर

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